अब बिना बिजली और AC के ठंडा रहेगा आपका कमरा, जाने इस नई टेक्नोलॉजी से कैसे मिलेगा फायदा ?

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अब बिना बिजली और AC के ठंडा रहेगा आपका कमरा, जाने इस नई टेक्नोलॉजी से कैसे मिलेगा फायदा ?

Udaipur Times, Cooling Without Electricity : अब बिना बिजली और AC के ही आपका घर एकदम कूल-कूल रहेगा। ये सुनकर आप भी दंग रह गए ना। दरअसल, ग्राज यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी (TU Graz) के रिसर्चर्स ने 3D प्रिंटेड सिरेमिक क्यूब्स का निर्माण किया है जिसकी सहायता से बिना एसी और बिजली के ही हवा को ठंडा करते हैं। ये क्यूब्स वाष्पीकरण से ठंडक रखने का काम करते हैं। उदाहरण के लिए, जैसे मिट्टी (सिरेमिक) का बर्तन जब पानी सोखता है, तो वह पानी धीरे-धीरे भाप बनकर उड़ने लगता है और आस-पास की गर्मी को सोख लेता है। गर्मी के मौसम में घर के ऊपर वाले फ्लोर पर किए गए एक प्रयोग में देखा गया कि पानी से भरे इस तरह के एक क्यूब के ठीक पास का तापमान लगभग 7°C (12.6°F) तक कम हो गया। 

सदियों पुरानी टेक्नोलॉजी को नए तरीके से आधुनिक और बेहतर बनाया गया

बता दें कि यह प्रोजेक्ट TU Graz के इंस्टीट्यूट ऑफ आर्किटेक्चर एंड मीडिया का है। शोधकर्ता (रिसर्चर) मिलेना स्टावरिक ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि यह सदियों पुरानी ही टेक्नोलॉजी है, जिसे बस आज की नई तकनीक से बेहतर और आधुनिक तरीके से बनाया गया है। मिट्टी के घड़े और ट्रेडिशनल विंड टावर सदियों से इवैपोरेटिव कूलिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। अब 3D प्रिंटिंग से ऐसे डिजाइन करना मुमकिन हो गया है, जिससे यह असर ज्यादा से ज्यादा हो सके। 

डिजिटल रुप से तैयार हर क्यूब की साइड लगभग 9 इंच की होती है। मिट्टी के मिश्रण से से प्रिंट किए गए क्यूब को कम तापमान पर पकाया जाता है ताकि एक बहुत ज्यादा पोरस (छिद्रों वाला) मटीरियल बन सके। 

बड़े हिस्से से पानी लगातार भाप बनकर उड़ता  

इसकी असली खासियत इसका खास डिजाइन TPMS स्ट्रक्चर है। आपबको बता दें कि इस डिजाइन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि कम सामान में भी पानी को फैलने के लिए बहुत ज्यादा जगह मिल जाती है। पानी अपने आप मिट्टी (सिरेमिक) के बारीक छेदों में सोख लिया जाता है और पूरे डिजाइन में बराबर फैल जाता है। इसके बाद बड़े हिस्से से पानी लगातार भाप बनकर उड़ता रहता है और आस-पास की हवा की गर्मी को खींचकर माहौल को ठंडा कर देता है।

स्टावरिक ने बताया कि यह तरीका सदियों से काम कर रहा है, चाहे मिट्टी के घड़े हों या ट्रेडिशनल विंड टावर। इसमें सबसे मुख्य बात 3D प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल है, जिसकी मदद से मिट्टी के घोल से बहुत ही बारीकी वाले, बारीक छेदों वाले और ज्यादा असरदार डिजाइन आसानी से बनाए जा सकते हैं। 

कम हो जाता है तापमान

क्यूब की प्रिंटिंग से पहले मिट्टी में फंगल कल्चर और लकड़ी का बुरादा मिलाया जाता है। इसके बाद मटीरियल के अंदर माइसेलियम यानी फंगल फिलामेंट्स का धागे जैसा नेटवर्क पनपता है। इसके बाद फिर क्यूब को पकाया जाता है। इस दौरान फंगल मटीरियल और लकड़ी का बुरादा जलकर खत्म हो जाते हैं। अंत में सिरेमिक के छोटे और बड़े छिद्रों का एक घना नेटवर्क बचता है। इन छिद्रों से पानी आसानी से फैलता है, जिससे कूलिंग का असर बेहतर होता है। 

शोधकर्ता टीम मिलकर अभी आस्ट्रिया की न्यूसीडल झील की तलछट (sediment) के साथ भी प्रयोग कर रही है। TU Graz में एक कंट्रोल्ड फील्ड टेस्ट में इसके असर को सीधे मापा गया। शोधकर्ताओं  ने पानी से भरा एक क्यूब गर्म एटिका में रखा और आसपास के तापमान पर नजर रखी। क्यूब के ठीक आसपास की हवा का तापमान लगभग 7°C (12.6°F) कम हो गया।

क्रिस्टिजन रिस्टोस्की का कहना है कि पूरे कमरे में कूलिंग का असर साफ महसूस किया जा सकता था। उन्होंने क्यूब्स और पानी की सप्लाई को मिलाकर एक कूलिंग वॉल बनाने पर अपनी मास्टर थीसिस लिखी थी। अब TU Graz के ग्राज स्थित कैंपस न्यू टेक्निक (Campus Neue Technik) में 2 गुणा 2 मीटर (6.6 गुणा 6.6 फीट) की एक डेमो वॉल बनी हुई है। आम लोग इसे देख सकते हैं और इसके असर को खुद महसूस कर सकते हैं। एक दूसरा इंस्टॉलेशन ग्राज के म्यूजियम ऑफ परसेप्शन में भी लगाया गया है।

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