हरियाणा में निजी बस ऑपरेटर की चेतावनी, सरकार ने नहीं बढ़ाया किराया तो परमिट कर देंगे सरेंडर

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हरियाणा में निजी बस ऑपरेटर की चेतावनी, सरकार ने नहीं बढ़ाया किराया तो परमिट कर देंगे सरेंडर

Udaipur Times, Haryana News, कुरुक्षेत्र : हरियाणा से बड़ी खबर सामने आ रही है। हरियाणा में प्राइवेट बस ऑपरेटर्स और परिवहन विभाग में तनातनी गहराने लगी है। 6 साल से किराये में बढ़ोतरी की राह देख रहे निजी बस संचालक अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। डीजल की बढ़ती कीमतों, स्पेयर पार्ट्स की लागत और भारी टैक्स के चलते ऑपरेटर्स ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने जल्द किराया संशोधन नहीं किया तो वे अपने परमिट सरेंडर कर सड़कों से बसें हटा लेंगे। ऐसे में प्रदेश में करीब 2 हजार स्टेज कैरिज बसों के पहिये थम जाएंगे।

ऑपरेटर्स का कहना है कि साल 2020 के बाद से प्रदेश में बस किराए में कोई संशोधन नहीं हुआ है। इन वर्षों में डीजल की कीमतें कई गुना बढ़ चुकी हैं, इंश्योरेंस प्रीमियम, टोल टैक्स, टायर और मेंटेनेंस खर्च में भारी उछाल आया है। इसके बावजूद वे पुराने किराये पर बसें चलाने को मजबूर हैं, जिससे हर महीने हजारों रुपए का घाटा उठाना पड़ रहा है। बता दें कि अकेले कुरुक्षेत्र जिले की बात करें तो यहां 67 बसों को स्टेज कैरिज के परमिट जारी हैं।

2 रुपए प्रति किमी किराया निर्धारित करे सरकार

किराया बढ़ाने की मांग: स्टेज कैरिज ट्रांसपोर्ट सोसाइटी एंड प्राइवेट बस ऑपरेटर्स वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. धन सिंह ने सरकार से स्टेज कैरिज बसों का यात्री किराया उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई/महंगाई दर) के अनुसार तुरंत बढ़ाने की मांग की है।

6 वर्षों से नहीं बढ़ा किराया: 15 मई 2020 के बाद बस किराये में कोई संशोधन नहीं हुआ है, जबकि इस दौरान डीजल, बीमा, स्पेयर पार्ट्स, टायर, रखरखाव और कर्मचारियों के वेतन की लागत में लगातार भारी बढ़ोतरी हुई है।

1993 की दर के आधार पर समायोजन: एसोसिएशन के अनुसार, 1993 में निर्धारित 22 पैसे प्रति किलोमीटर की दर को वर्तमान महंगाई के हिसाब से समायोजित कर लगभग 2 रुपये प्रति किलोमीटर किया जाना चाहिए।

केंद्र सरकार की रिपोर्ट का हवाला: भारत सरकार का सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय भी सार्वजनिक परिवहन को आर्थिक रूप से मजबूत करने और परिचालन लागत के अनुसार किराया संशोधित करने का सुझाव देता रहा है।

निजी संचालकों पर वित्तीय बोझ: रोडवेज को होने वाले सालाना लगभग 1,000 करोड़ रुपये के घाटे की भरपाई तो राज्य सरकार करती है, लेकिन सहकारी परिवहन समितियों और निजी बस संचालकों को खुद उठाना पड़ रहा है।

अड्डा फीस पर जीएसटी और वार्षिक वृद्धि पर भी सवाल

एसोसिएशन ने सरकारी बस स्टैंड पर वसूली जाने वाली अड्डा फीस पर जीएसटी लगाने व हर वर्ष शुल्क बढ़ाने पर भी आपत्ति जताई है। ऑपरेटर्स का कहना है कि बस स्टैंड सरकारी संपत्ति हैं और उनका रखरखाव सरकारी विभाग करता है तो शुल्क एवं जीएसटी की वैधता की समीक्षा आवश्यक है। उन्होंने मांग की कि संबंधित सरकारी अधिसूचनाओं और लागू जीएसटी प्रावधानों के अनुरूप निर्णय लेते हुए अनधिकृत वसूली पर रोक लगाई जाए व बिना अतिरिक्त सुविधाएं दिए वार्षिक शुल्क वृद्धि बंद की जाए। यदि सरकार द्वारा जल्द ही किराया नहीं बढ़ाया गया, तो एसोसिएशन अपनी लगभग 2,000 बसों के परमिट और चाबियां सरकार को सौंपने के लिए मजबूर होगी।

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