दादा के कंधे पर लगे सितारों को देख प्रियदर्शिनी ने रचा इतिहास, दूसरे प्रयास में बनी वायुवीर टॉपर
Udaipur Times, Priyadarshini Success Story : राजस्थान के बाड़मेर-जैसलमेर को कभी बेटियों की चुनौतियों से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन अब इसी क्षेत्र की बेटियां देशसेवा और सफलता की नई मिसाल कायम कर रही हैं। भारत-पाकिस्तान सीमा पर बसे रामसर गांव की प्रियदर्शिनी राजपुरोहित ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प से बाड़मेर जिले का नाम रोशन किया है। प्रियदर्शिनी जिले की पहली वायुवीर बनी हैं और उन्होंने अपने दूसरे प्रयास में ऑल इंडिया प्रथम रैंक हासिल की है। उनके इस सफर में सबसे बड़ी प्रेरणा उनके दादा की वर्दी और कंधे पर सजे दो सितारे रहे हैं।
प्रियदर्शिनी के पिता किशन सिंह मनिहारी की दुकान चलाते हैं। परिवार की आर्थिक परिस्थितियां भले ही सामान्य रही हों, लेकिन प्रियदर्शिनी ने अपने लक्ष्य के रास्ते में संसाधनों की कमी को बाधा नहीं बनने दिया। बचपन में जब वह अपने दादा बागसिंह के कंधे पर वर्दी के दो सितारे देखती थीं, तभी उनके मन में भी वर्दी पहनकर देश और समाज की सेवा करने का सपना पैदा हुआ। इसी सपने को उन्होंने अपनी मेहनत और तैयारी के जरिए हकीकत में बदल दिया।
दादा के कंधे पर लगे सितारों से मिली प्रियदर्शिनी को प्रेरणा
प्रियदर्शिनी के लिए उनके दादा बागसिंह सबसे बड़े प्रेरणास्रोत रहे हैं। बचपन से ही दादा को वर्दी में देखकर उनके मन में भी देशसेवा की इच्छा पैदा हुई। कंधे पर लगे दो सितारे उन्हें हमेशा यह याद दिलाते रहे कि वर्दी सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और सेवा का प्रतीक भी है। समय के साथ यह सपना और मजबूत होता गया। प्रियदर्शिनी ने ठान लिया कि वह भी वर्दी पहनकर देश की सेवा करेंगी। इसके बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ सेना और सुरक्षा सेवाओं से जुड़े लक्ष्य की दिशा में तैयारी शुरू की। परिवार के सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने लगातार मेहनत जारी रखी।
बाड़मेर पीजी कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई की पूरी
प्रियदर्शिनी ने बाड़मेर के पीजी कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के साथ उन्होंने एनसीसी का सी सर्टिफिकेट भी हासिल किया। एनसीसी की ट्रेनिंग ने उनके अनुशासन और नेतृत्व क्षमता को मजबूत करने में मदद की और वर्दी पहनकर देशसेवा करने के उनके लक्ष्य को और स्पष्ट दिशा मिली। कॉलेज के दौरान उन्होंने अपनी पढ़ाई और प्रतियोगी तैयारी के बीच संतुलन बनाए रखा। उनके लिए यह सफर आसान नहीं था, लेकिन लक्ष्य को लेकर स्पष्टता और लगातार मेहनत ने उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दिया।
पहले प्रयास में नहीं मिली सफलता
प्रियदर्शिनी को अपने पहले प्रयास में सफलता नहीं मिली। परीक्षा में असफलता मिलने के बाद भी उन्होंने इसे अपनी मंजिल का अंत नहीं माना। उन्होंने पहले प्रयास के दौरान हुई कमियों को समझा और अपनी तैयारी में जरूरी बदलाव किए। असफलता से निराश होने के बजाय उन्होंने इसे सीख के तौर पर लिया। दूसरे प्रयास में उन्होंने पहले से ज्यादा व्यवस्थित तरीके से तैयारी की और अपनी कमजोरियों पर काम किया। यही मेहनत आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी सफलता की वजह बनी।
दूसरे प्रयास में हासिल की ऑल इंडिया प्रथम रैंक
पहले प्रयास की कमियों से सीख लेकर प्रियदर्शिनी ने दूसरे प्रयास में पूरी मेहनत के साथ तैयारी की। इस बार उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए ऑल इंडिया प्रथम रैंक हासिल कर ली। दूसरे प्रयास में मिली यह सफलता उनके लिए खास इसलिए भी रही क्योंकि यह उस सपने की ओर बड़ा कदम था, जिसे उन्होंने बचपन में अपने दादा की वर्दी देखकर देखा था। ऑल इंडिया प्रथम रैंक हासिल करने के बाद प्रियदर्शिनी न सिर्फ अपने परिवार बल्कि पूरे बाड़मेर जिले के लिए प्रेरणा बन गईं। उनकी सफलता ने यह भी दिखाया कि छोटे शहर और सीमावर्ती इलाकों से आने वाले युवा भी सही दिशा, मेहनत और दृढ़ संकल्प के साथ राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं।
कर्नाटक में पूरी की ट्रेनिंग
चयन के बाद प्रियदर्शिनी ने कर्नाटक के बेलगावी में अपनी ट्रेनिंग पूरी की। प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने वर्दी से जुड़ी जिम्मेदारियों और जरूरी कौशल को सीखा। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद उनकी तैनाती वायुसेना स्टेशन हैदराबाद में हुई है। बचपन में जिस वर्दी को उन्होंने अपने दादा के कंधे पर देखा था, अब उसी वर्दी को पहनकर वह देशसेवा की जिम्मेदारी निभा रही हैं। उनके लिए यह उपलब्धि व्यक्तिगत सफलता के साथ परिवार और अपने क्षेत्र के लिए भी गर्व का विषय है।
बाड़मेर लौटने पर हुआ भव्य स्वागत
ट्रेनिंग पूरी करने के बाद जब प्रियदर्शिनी बाड़मेर लौटीं तो उनका भव्य स्वागत किया गया। स्थानीय लोगों और परिवार के सदस्यों ने उनकी उपलब्धि पर खुशी जताई। सीमावर्ती क्षेत्र से निकलकर देशसेवा के क्षेत्र में यह उपलब्धि हासिल करने वाली प्रियदर्शिनी को लेकर क्षेत्र में खास उत्साह देखने को मिला। प्रियदर्शिनी ने अपनी सफलता का श्रेय अपनी मेहनत, परिवार के सहयोग और दादा से मिली प्रेरणा को दिया। उनके मुताबिक, बचपन से दादा के कंधे पर सजे दो सितारे उनके लिए प्रेरणा रहे हैं और उन्होंने हमेशा उन्हें देखकर वर्दी पहनने का सपना देखा।
बोलीं- ईमानदारी और निष्ठा से करूंगी देशसेवा
प्रियदर्शिनी का कहना है कि पहले प्रयास में मिली असफलता से उन्होंने अपनी कमियों को पहचाना और दूसरे प्रयास में उन पर काम किया। इसके बाद ऑल इंडिया प्रथम रैंक हासिल करना उनके लिए गर्व का पल है। उनका लक्ष्य सिर्फ वर्दी पहनना नहीं बल्कि इस जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ निभाना है। प्रियदर्शिनी का कहना है कि जिस वर्दी को उन्होंने कभी सपने में देखा था, अब उसे पहनकर वह पूरी जिम्मेदारी के साथ देश और समाज की सेवा करना चाहती हैं।
दूसरी बेटियों के लिए बनीं प्रेरणा
प्रियदर्शिनी की सफलता सिर्फ उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। बाड़मेर-जैसलमेर जैसे सीमावर्ती क्षेत्र की बेटियों के लिए भी उनकी कहानी एक प्रेरणा बनकर सामने आई है। उन्होंने साबित किया है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, लक्ष्य के प्रति समर्पण और लगातार मेहनत से सफलता हासिल की जा सकती है। एक दुकान चलाने वाले परिवार से निकलकर वर्दी पहनने और दूसरे प्रयास में ऑल इंडिया प्रथम रैंक हासिल करने तक का प्रियदर्शिनी का सफर उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा है जो पहली असफलता के बाद अपने लक्ष्य से पीछे हट जाते हैं। उनकी कहानी बताती है कि असफलता मंजिल का अंत नहीं, बल्कि अगली तैयारी के लिए एक सीख हो सकती है।