रेलवे का यात्रियों को बड़ा तोहफा ! देश के इन 8 रूटों पर दौड़ेगी 35 हाइड्रोजन ट्रेनें, जाने पूरा प्लान ?
Udaipur Times, Hydrogen for Heritage : भारतीय रेलवे अब देश के ऐतिहासिक और पहाड़ी रेल रूटों को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। रेलवे की ‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’ योजना के तहत देश के 8 पहाड़ी रूटों पर कुल 35 हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की योजना है। इन ट्रेनों पर करीब 2,800 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
इस योजना का मकसद उन पहाड़ी इलाकों में डीजल पर निर्भरता कम करना है, जहां रेलवे ट्रैक का विद्युतीकरण करना मुश्किल है। संकरे रास्ते, घुमावदार ट्रैक, बर्फबारी और भूस्खलन जैसी परिस्थितियां पहाड़ी रूटों पर इलेक्ट्रिफिकेशन को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। ऐसे में हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनें एक वैकल्पिक और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प बन सकती हैं।
8 पहाड़ी रूटों पर दौड़ती नज़र आएंगी 35 ट्रेनें
रेल मंत्रालय और संबंधित रिपोर्टों के मुताबिक, हाइड्रोजन ट्रेनों के लिए देश के 8 प्रमुख पहाड़ी रूट चुने गए हैं। इनमें शामिल हैं:
कालका-शिमला
कांगड़ा घाटी
दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे
नीलगिरी माउंटेन रेलवे
माथेरान हिल रेलवे
बिलमोरा-वाघई
मऊ-पातालपानी
मारवाड़-देवगढ़ मदारिया
इनमें से कई रूटों पर हाइड्रोजन ट्रेन संचालन से जुड़ा काम आगे बढ़ाया जा रहा है। रेलवे ने इन रूटों को विकसित करने के लिए करीब 2030 तक की टाइमलाइन तय की है।
एक ट्रेन पर रु80 करोड़ का खर्च
हाइड्रोजन ट्रेन प्रोजेक्ट में रेलवे को बड़ा निवेश करना होगा। एक हाइड्रोजन ट्रेन की अनुमानित लागत करीब 80 करोड़ रुपये बताई गई है।
35 ट्रेनों के लिए करीब 2,800 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसके अलावा 8 पहाड़ी रूटों को हाइड्रोजन ट्रेन संचालन के लिए तैयार करने पर प्रति रूट लगभग 70 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इस तरह सिर्फ रूट से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर करीब 560 करोड़ रुपये का खर्च आएगा।
पहाड़ी इलाकों में क्यों जरूरी है हाइड्रोजन ट्रेन?
पहाड़ी रेलवे रूट देश की प्राकृतिक और ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनमें से कई इलाकों में रेलवे लाइन बेहद संकरी और घुमावदार है।
इन रूटों पर बिजली के तार और अन्य इलेक्ट्रिफिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना आसान नहीं है। भारी बर्फबारी, भूस्खलन और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण निर्माण और रखरखाव दोनों चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
हाइड्रोजन ट्रेन में इलेक्ट्रिक मोटर को बिजली देने के लिए हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इससे डीजल इंजन की तुलना में स्थानीय स्तर पर उत्सर्जन काफी कम किया जा सकता है।
जींद-सोनीपत रूट से शुरू हुआ है हाइड्रोजन ट्रेन का सफर
भारत में हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक को आगे बढ़ाने के लिए जींद-सोनीपत रूट महत्वपूर्ण बन गया है। दी गई जानकारी के मुताबिक, देश की पहली कमर्शियल हाइड्रोजन ट्रेन ने 17 जुलाई 2026 से इस रूट पर संचालन शुरू किया।
यह ट्रेन करीब 90 किलोमीटर की दूरी लगभग 2 घंटे में तय करती है। ट्रेन की अधिकतम गति करीब 110 किलोमीटर प्रति घंटा बताई गई है।
इस ट्रेन में 10 कोच हैं और इसमें लगभग 2,600 यात्रियों के बैठने की क्षमता है।
6,000 की कर चुकी है दूरी तय
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, संचालन शुरू होने के बाद यह हाइड्रोजन ट्रेन अब तक 6,000 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय कर चुकी है। इस दौरान करीब 36 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम होने का दावा किया गया है।
यह आंकड़ा रेलवे के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आने वाले वर्षों में परिवहन क्षेत्र से कार्बन उत्सर्जन कम करना सरकार की बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल है।
जींद में बनाया गया है हाइड्रोजन का बड़ा स्टोरेज सिस्टम
हाइड्रोजन ट्रेन के संचालन के लिए सिर्फ ट्रेन तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए अलग ईंधन स्टोरेज और रिफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की भी जरूरत होती है।
जींद में रेलवे का बड़ा हाइड्रोजन स्टोरेज और रिफ्यूलिंग सिस्टम तैयार किया गया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यहां एक समय में करीब 3,000 किलोग्राम कंप्रेस्ड हाइड्रोजन गैस स्टोर की जा सकती है।
इस संयंत्र की सुरक्षा से जुड़ी जांच और प्रमाणन प्रक्रिया भी पूरी की गई है।
पहाड़ी रूट पर हाइड्रोजन पहुंचाना हो सकता है बड़ी चुनौती
हालांकि हाइड्रोजन ट्रेनें पर्यावरण के लिहाज से आकर्षक विकल्प हैं, लेकिन इनके सामने कई तकनीकी चुनौतियां भी हैं।
सबसे बड़ी चुनौती पहाड़ी और दूर-दराज के इलाकों में हाइड्रोजन की सप्लाई और स्टोरेज की होगी। इसके अलावा इन रूटों के संकरे और घुमावदार ट्रैक को ध्यान में रखते हुए ट्रेनों का डिजाइन और संचालन भी करना होगा।
रेलवे को रिफ्यूलिंग स्टेशन, सुरक्षा व्यवस्था और हाइड्रोजन स्टोरेज जैसी सुविधाएं भी विकसित करनी होंगी।
रेलवे का इलेक्ट्रिफिकेशन भी तेजी से बढ़ा
हाइड्रोजन ट्रेन योजना ऐसे समय में आगे बढ़ रही है जब भारतीय रेलवे अपने ब्रॉड गेज नेटवर्क के बड़े हिस्से का विद्युतीकरण कर चुका है।
2014 से 2026 के बीच रेलवे ने हजारों रूट किलोमीटर का इलेक्ट्रिफिकेशन किया है। हालांकि कुछ दुर्गम और विरासत वाले पहाड़ी रूटों पर इलेक्ट्रिफिकेशन अब भी चुनौतीपूर्ण है। इन्हीं जगहों पर हाइड्रोजन तकनीक को वैकल्पिक समाधान के तौर पर देखा जा रहा है।
भारत बना हाइड्रोजन ट्रेन चलाने वाला पांचवां देश बना
हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक अभी दुनिया में सीमित देशों में ही इस्तेमाल हो रही है। जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन और चीन के बाद भारत भी इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाले देशों की सूची में शामिल हो गया है।
भारत की योजना अब इस तकनीक को सिर्फ एक रूट तक सीमित रखने की नहीं है। 8 पहाड़ी रूटों पर 35 ट्रेनों की योजना सफल होती है तो देश के ऐतिहासिक पहाड़ी रेल नेटवर्क में साफ-सुथरे और आधुनिक परिवहन का नया अध्याय शुरू हो सकता है।
पहाड़ी पर्यटन को भी मिलेगा फायदा पहाड़ो में बढ़ेगी इनकम
कालका-शिमला, दार्जिलिंग, नीलगिरी और माथेरान जैसे रूट पर्यटन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में हाइड्रोजन ट्रेनें सिर्फ प्रदूषण कम करने का माध्यम नहीं होंगी, बल्कि इन ऐतिहासिक रेल मार्गों पर पर्यटकों के लिए सफर का अनुभव भी बदल सकती हैं।यानी आने वाले वर्षों में पहाड़ों के खूबसूरत नजारों के बीच डीजल इंजन की जगह हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनें दौड़ती दिखाई दे सकती हैं।