पानी पर तैरेंगे सोलर पैनल ! बिजली बनाने के साथ करेंगे पानी की बचत, जाने कैसे नई तकनीक बदलेगी दुनिया की तस्वीर
Udaipur Times, Floating Solar Farms : दुनिया भर में बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और पानी की कमी ने वैज्ञानिकों को नए समाधान तलाशने के लिए प्रेरित किया है। इसी दिशा में फ्लोटिंग सोलर फार्म (Floating Solar Farms) या फ्लोटिंग फोटोवोल्टिक सिस्टम (FPV) एक क्रांतिकारी तकनीक के रूप में उभर रहे हैं। ये ऐसे सोलर पैनल हैं, जिन्हें जमीन की बजाय झीलों, बांधों और जलाशयों की सतह पर तैरते हुए प्लेटफॉर्म पर लगाया जाता है।
यह तकनीक न केवल बिजली उत्पादन करती है, बल्कि पानी के संरक्षण में भी बड़ी भूमिका निभाती है। ऑस्ट्रेलिया, भारत, जर्मनी और अमेरिका जैसे देश अब तेजी से इस तकनीक को अपना रहे हैं।
क्या हैं फ्लोटिंग सोलर पैनल?
फ्लोटिंग सोलर पैनल विशेष प्रकार के तैरते हुए प्लेटफॉर्म पर लगाए जाते हैं, जो जलाशयों और बांधों की सतह पर स्थापित किए जाते हैं। इन प्रणालियों में सोलर पैनल, फ्लोटिंग स्ट्रक्चर, एंकरिंग सिस्टम, इन्वर्टर और अंडरवाटर केबल शामिल होती हैं, जो बिजली को ग्रिड तक पहुंचाती हैं।
इस तकनीक की शुरुआत वर्ष 2007 में हुई थी और अब यह दुनिया के कई देशों में तेजी से फैल रही है।
पानी बचाने में बेहद कारगर
ऑस्ट्रेलिया लंबे समय से पानी की कमी और सूखे की समस्या से जूझ रहा है। देश में खेती के लिए कुल जल आपूर्ति का करीब 70 प्रतिशत पानी इस्तेमाल होता है। ऐसे में फ्लोटिंग सोलर पैनल एक बड़ी राहत बनकर सामने आए हैं।
ऑस्ट्रेलिया के बांधों और जलाशयों से हर साल लगभग 1,400 गीगालीटर पानी वाष्पीकरण के कारण खत्म हो जाता है। फ्लोटिंग सोलर पैनल पानी की सतह को ढककर सूर्य की सीधी गर्मी को कम करते हैं, जिससे वाष्पीकरण में 50 से 70 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।
बिजली भी बनेगी, पानी भी बचेगा
इन पैनलों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये एक साथ दो काम करते हैं। एक तरफ ये पानी को वाष्पीकृत होने से बचाते हैं, वहीं दूसरी ओर सौर ऊर्जा से बिजली पैदा करते हैं। पानी की सतह के कारण आसपास का तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है, जिससे सोलर पैनल ज्यादा कुशलता से काम करते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, फ्लोटिंग सोलर सिस्टम जमीन पर लगे सोलर प्लांट की तुलना में 5 से 10 प्रतिशत अधिक बिजली उत्पादन कर सकते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में सफल प्रयोग
ऑस्ट्रेलिया के दक्षिणी विक्टोरिया स्थित ब्रायर्ली बेसिन में देश के सबसे बड़े फ्लोटिंग सोलर सिस्टम में से एक लगाया गया है। यहां लगे 1,260 सोलर पैनल हर साल 6 लाख किलोवाट-घंटे से अधिक बिजली पैदा करते हैं। इन पैनलों की खास बात यह है कि ये केवल सीधे सूर्य की रोशनी ही नहीं, बल्कि पानी से परावर्तित होने वाली रोशनी को भी ऊर्जा में बदलते हैं। इस परियोजना से हर साल लगभग 600 टन कार्बन उत्सर्जन में कमी आ रही है।
वहीं, ऑस्ट्रेलिया के गिप्सलैंड क्षेत्र में लगाए गए 644 फ्लोटिंग सोलर पैनल प्रतिदिन करीब 90 घरों को बिजली देने के लिए पर्याप्त ऊर्जा पैदा कर रहे हैं।
भारत भी तेजी से बढ़ा रहा कदम
भारत भी इस तकनीक को तेजी से अपना रहा है। देश का सबसे बड़ा फ्लोटिंग सोलर प्लांट तेलंगाना के रामागुंडम में 100 मेगावाट क्षमता के साथ स्थापित किया गया है।
भारत सरकार आने वाले वर्षों में 10 गीगावाट फ्लोटिंग सोलर क्षमता विकसित करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। कई राज्यों में जलाशयों और बांधों पर नए प्रोजेक्ट तैयार किए जा रहे हैं।
फ्लोटिंग सोलर फार्म के बड़े फायदे
जमीन की बचत
कृषि भूमि का अधिग्रहण नहीं करना पड़ता।
खाली पड़े जलाशयों का उपयोग हो जाता है।
एक ही संसाधन से दोहरा लाभ मिलता है।
बेहतर प्रदर्शन
पानी के कारण पैनल ठंडे रहते हैं।
धूल कम जमती है, जिससे रखरखाव खर्च घटता है।
बिजली उत्पादन अधिक होता है।
पर्यावरण को फायदा
लाखों लीटर पानी की बचत।
कार्बन उत्सर्जन में कमी।
जलाशयों में शैवाल की अत्यधिक वृद्धि को रोकने में मदद।
भूजल संरक्षण में सहायता।
कुछ चुनौतियां भी
हालांकि इस तकनीक के कई फायदे हैं, लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियां भी हैं।
तेज हवा और तूफान से सुरक्षा।
पानी में उपकरणों को जंग से बचाना।
एंकरिंग और केबल प्रबंधन।
शुरुआती लागत जमीन आधारित परियोजनाओं से 10-15 प्रतिशत अधिक होना।
फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय में इसकी लागत की भरपाई अधिक बिजली उत्पादन और पानी की बचत से हो जाती है।
भविष्य की ऊर्जा का नया रास्ता
पानी और जमीन दोनों संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच फ्लोटिंग सोलर फार्म भविष्य की ऊर्जा जरूरतों का एक टिकाऊ समाधान बनकर उभर रहे हैं। ये तकनीक न केवल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देती है, बल्कि जल संरक्षण, कार्बन उत्सर्जन में कमी और पर्यावरण सुरक्षा में भी अहम योगदान दे रही है।
आने वाले वर्षों में भारत समेत दुनिया के कई देशों में जलाशयों पर तैरते सोलर पैनल आम नजारा बन सकते हैं और यह तकनीक ऊर्जा क्षेत्र में एक नई क्रांति ला सकती है।
