60 रुपये रोज में बच्चों को पढ़ाया ! जहां की पढ़ाई उसी स्कूल की बनीं शिक्षिका, अब राष्ट्रपति से करेंगी सम्मानित

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60 रुपये रोज में बच्चों को पढ़ाया ! जहां की पढ़ाई उसी स्कूल की बनीं शिक्षिका, अब राष्ट्रपति से करेंगी सम्मानित

Udaipur Times, Success Story of Teacher Suman Goel : ये कहानी है संघर्षों की, अपने सपनों को साकार करने की, धैर्य की और लगन की।  हरियाणा के एक छोटे से गांव से दिल्ली तक का सफ़र, परिवार की आर्थिक तंगी का सामना करना, अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए 11वीं कक्षा से ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना  और बाद में उसी स्कूल में दिहाड़ी पर टीचर के तौर पर काम करने वाली पूठ कलां के सर्वोदय कन्या विद्यालय की प्राइमरी टीचर सुमन गोयल के बारें में आज हम आपको बताने जा रहे हैं। 

राष्ट्रपति दिल्ली के विज्ञान भवन में सुमन गोयल को 'नेशनल टीचर्स अवॉर्ड' से सम्मानित करेंगी 

​​संघर्षों से भरे इस लंबे सफ़र में, उन्होंने कभी भी हालात को अपनी राह में रुकावट नहीं बनने दिया। कड़ी मेहनत, अपने टीचरों के मार्गदर्शन और परिवार के सहयोग से, उन्होंने न केवल  सरकारी टीचर बनने का अपना सपना पूरा किया, बल्कि अब देश के चुनिंदा बेहतरीन शिक्षकों में अपनी खास पहचान भी बनाई है। सुमन गोयल को 'नेशनल टीचर्स अवॉर्ड 2026' के लिए चुना गया है।

5 सितंबर 2026 को टीचर्स डे के मौके पर, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू दिल्ली के विज्ञान भवन में उन्हें 'नेशनल टीचर्स अवॉर्ड' से सम्मानित करेंगी। उनके लिए यह सम्मान सिर्फ़ उनकी अपनी कामयाबी नहीं है, बल्कि उनके संघर्षों और सालों तक मिले टीचरों, साथियों और परिवार के सहयोग का नतीजा है। गौरतलब है कि इस साल 48 स्कूल टीचरों को 'नेशनल टीचर्स अवॉर्ड' मिलेगा। इनमें दिल्ली से सुमन गोयल अकेली टीचर हैं।

60 रुपये रोज पर बच्चों को पढ़ाया

सुमन गोयल ने रोहिणी (उत्तर-पश्चिम दिल्ली, ज़ोन B-1) के पूठ कलां स्थित सर्वोदय कन्या विद्यालय से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की, जहां वह 12वीं कक्षा में स्कूल टॉपर रही थीं। इसके बाद, उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के लक्ष्मीबाई कॉलेज में BA प्रोग्राम में दाखिला लिया। ग्रेजुएशन के दौरान अपनी पढ़ाई का खर्च उठाना मुश्किल हो रहा था, इसलिए उन्होंने उसी स्कूल का रुख किया जहाँ से उन्होंने 12वीं की पढ़ाई पूरी की थी।

उन्होंने उस स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। 2004 तक, वह हर महीने लगभग 1,200–1,300 रुपये कमा रही थीं। उन्हें रोज़ाना 60 रुपये की दिहाड़ी मिलती थी, जिसका इस्तेमाल वह अपनी कॉलेज की फ़ीस भरने के लिए करती थीं।

2009 में सरकारी टीचिंग की नौकरी मिली
उन्होंने अपने स्कूल के शिक्षकों की मदद से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की। उन्हें 2009 में पक्की सरकारी नौकरी मिली और 2013 से वह इसी स्कूल में प्राइमरी टीचर के तौर पर काम कर रही हैं। उनका कहना है कि अपने पुराने स्कूल में लौटना सिर्फ़ करियर का फ़ैसला नहीं था। यह उस संस्थान में वापसी थी जिसे वह अपनी ज़िंदगी को आकार देने का श्रेय देती हैं।

वह एक मां-टीचर की तरह पढ़ाती हैं

सुमन खुद को एक मां-टीचर मानती हैं। वह कहती हैं, "मैं सभी बच्चों के परिवारों को अच्छी तरह जानती हूं। इससे मुझे उन्हें समझने और पढ़ाने में मदद मिलती है। पूठ कलां, कृष्णा विहार और मांगे राम पार्क जैसे इलाकों से आने वाले ज़्यादातर बच्चे 'फर्स्ट-जेनरेशन लर्नर' (परिवार में पढ़ने-लिखने वाले पहले व्यक्ति) हैं, जिनके माता-पिता दिहाड़ी मज़दूर हैं; इसलिए, इन बच्चों को समझना बहुत ज़रूरी है।" वह न सिर्फ़ उनकी पढ़ाई-लिखाई पर, बल्कि ज़रूरतमंद बच्चों की स्वेटर, स्टेशनरी, सेहत और पोषण जैसी ज़रूरतों पर भी पूरा ध्यान देती हैं।

परिवार बना सबसे बड़ा सहारा

सुमन की सफलता की कहानी में उनके परिवार के सहयोग की अहम भूमिका रही। शादी के बाद उन्होंने अपने पिता को खो दिया और लगभग चार-पांच साल बाद उनकी मां का भी निधन हो गया। ज़िंदगी के इस मुश्किल दौर में उनके ससुराल वालों ने उनका साथ दिया। सुमन अपने पति गौरव से मिले सहयोग को बहुत प्यार से याद करती हैं। वह बताती हैं कि उन्होंने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया और घर की ज़िम्मेदारियों में हाथ बंटाया ताकि वह अपने प्रोफेशनल काम को आगे बढ़ा सकें। उनके ससुराल वालों ने भी उन्हें बेटी की तरह अपनाया; सुमन कहती हैं कि उन्होंने कभी उन्हें अपने माता-पिता की कमी महसूस नहीं होने दी।

काम को राष्ट्रीय पहचान मिलनी चाहिए

शुरुआत में सुमन 'नेशनल टीचर्स अवॉर्ड' के लिए खुद को नॉमिनेट करने को लेकर ज़्यादा उत्साहित नहीं थीं, लेकिन उनके पति लगातार उन्हें प्रोत्साहित करते रहे। उनका कहना था कि चूंकि वह बच्चों के लिए इतना बेहतरीन काम कर रही हैं, इसलिए उनके प्रयासों को राष्ट्रीय पहचान मिलनी चाहिए। इसी प्रोत्साहन ने उन्हें नॉमिनेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।

अवॉर्ड मिलने के बाद भी लक्ष्य वही 

जब उनसे पूछा गया कि क्या राष्ट्रीय पहचान मिलने के बाद उनकी ज़िम्मेदारियां बढ़ जाएँगी, तो सुमन ने कहा कि एक शिक्षक होना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है। वह कहती हैं कि चाहे कोई अवॉर्ड मिले या न मिले, हर शिक्षक पर राष्ट्र-निर्माण की ज़िम्मेदारी होती है। आज क्लासरूम में बैठे छोटे बच्चे ही देश का भविष्य तय करेंगे; कुछ डॉक्टर या इंजीनियर बनेंगे, तो कुछ देश का नेतृत्व भी कर सकते हैं। इसलिए, ऐसे बच्चों को तैयार करना जो भारत को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकें, हर शिक्षक के लिए एक अहम ज़िम्मेदारी है।

दिल से पढ़ाना देश का भविष्य बनाता है

देश भर के शिक्षकों के लिए सुमन का संदेश उनकी अपनी जीवन-सोच को दर्शाता है। उनका मानना ​​है कि जिस तरह देश की रक्षा करना एक सैनिक का परम लक्ष्य होता है, उसी तरह एक शिक्षक का लक्ष्य भारत के भविष्य के निर्माताओं को तैयार करना होना चाहिए। वह इस बात पर ज़ोर देती हैं कि बच्चों को सिर्फ़ पढ़ाना ही काफ़ी नहीं है; एक शिक्षक को उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ना चाहिए, उनकी ज़रूरतों को समझना चाहिए और सच्चे 'दिल से दिल के जुड़ाव' के ज़रिए उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करना चाहिए। सुमन का मानना ​​है कि अगर देश के शिक्षक इस उद्देश्य के साथ आगे बढ़ें, तो उन्हें न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिलेगी और एक ऐसी पीढ़ी तैयार होगी जो भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जाने में सक्षम होगी।

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