पहाड़ियों के संरक्षण से ही झीलों के शहर का अस्तित्व संभव
उदयपुर नगर चारों ओर पहाडियों से गिरा हुआ झीलो का शहर है। यह पहाडियां शहर की फतहसागर पिछोला तथा उदयसागर का केंचमेन्ट होने के साथ-साथ अपनी नैसर्गिक सौन्दर्य के कारण पर्यटन की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। लेकिन विगत वर्षाे में कतिपय व्यक्तियों द्वारा निजी स्वाथो के लिये इन पहाडियों का अनियोजित तरीकों से कटाव किया जा रहा है। जो न केवल झीलों के जीवन पर कुठाराघात है
Hills Near Pipliya Village
उदयपुर नगर चारों ओर पहाडियों से गिरा हुआ झीलो का शहर है। यह पहाडियां शहर की फतहसागर पिछोला तथा उदयसागर का केंचमेन्ट होने के साथ-साथ अपनी नैसर्गिक सौन्दर्य के कारण पर्यटन की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। लेकिन विगत वर्षाे में कतिपय व्यक्तियों द्वारा निजी स्वाथो के लिये इन पहाडियों का अनियोजित तरीकों से कटाव किया जा रहा है। जो न केवल झीलों के जीवन पर कुठाराघात है अपितु शहर के नैसर्गिक सौंन्दर्य को भी प्रभावित कर रहा है। यह बात मंगलवार को नगर विकास प्रन्यास में पहाडि़यों के संरक्षण को लेकर विषय विशेषज्ञों की बुलाई गई बैठक में प्रन्यास अध्यक्ष रवीन्द्र श्रीमाली ने कही
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उल्लेखनीय है कि नगर विकास प्रन्यास द्वारा विगत वर्षाे में इन पहाडि़यों के सरंक्षण हेतु समय-समय पर विभिन्न विभागों से समन्वय स्थापित कर उनके प्रस्ताव एंव सुझाव लिये जाते रहे हैं। इसी क्रम में यह बैठक बुलाई गई, जिसमें उनसे सुझाव देने का अनुरोध किया गया। उदयपुर के अधोघोषित नगरीय क्षैत्र में 130 राजस्व ग्राम है। जिनमें लगभग 92 पहाडियां हैं। श्रीमाली ने कहा कि शहर के पर्यटन विकास के लिये पहाडि़यों के अस्तित्व को नष्ट करने की कीमत पर कोई भी विकास उचित नहीं होगा। क्योकिं इन पहाडियों के कारण ही झीलों का अस्तित्व है और झीलों को बचाये रखना बेहद जरूरी है।

सेवानिवृत मुख्य नगर नियोजक राजस्थान श्री एच.एस.संचेती ने कहा कि शहर की किसी एक पहाडी को लेकर उसका मॉडल तैयार करवाया जाये जिस पर निर्माण के लिये रिसार्ट भवन की डिजाईन, रोड़ नेटवर्क, पार्किंग आदि के प्रावधान हों। जिससे यह समझा जा सके कि यदि इस मॉडल के अनुरूप भवन निर्माण किया जाता है तो पहाडी की कितनी कटिंग होगी और उस पर बनने वाले भवन का स्वरूप कैसा होगा।
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सुखाडि़या विश्व विद्यालय भूगोल विभाग के पूर्व प्रोफेसर डॉ.आर.एम. लोढा का सुझाव था कि नगरीय विकास के लिये पहाडियां काटने की बजाय नया सेटेलाईट टॉउन विकसित किया जाये। जल संसाधन विभाग के पूर्व अधीक्षण अभियन्ता जी.पी. सोनी ने कहा कि नगरीय विकास आवश्यक है, लेकिन विकास से पूर्व पहाडियों का ढलान इस तरह निर्धारित किया जाये कि वह व्यवहारिक रूप से उचित हो। पूर्व मुख्य वन संरक्षक एस.के. वर्मा का कहना था कि पहाडियों का ढलान निर्धारित करते समय 0 से 5 डिग्री, 5 से 11 डिग्री, 11 से 15 डिग्री और 15 से 20 डिग्री का ढलान सुनिश्चित किया जाकर उन पर विकास के प्रस्ताव तैयार किये जा सकते हैं। उनका यह भी सुझाव था कि शहर की मुख्य सड़कों के साथ जो पहाड़ियां स्थित हैं, उनमें अधिकांश निजी खातेदारों की है। अतः उन्हें वृक्षारोपण के लिये प्रोत्साहित किया जाये।
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उपवन संरक्षक ओ.पी. शर्मा ने कहा कि नगर क्षैत्र की पहाडियों को उनके ढलान एंव उंचाई के मध्यनजर अलग-अलग वर्गीकृत करने के विकास का प्रारूप बनाया जाये। बुद्धा इन्स्टीटयूट ऑफ आर्किटेक्चर के डीन संजय गुप्ते ने कहा कि पहाडियों की मूल शैली को ध्यान में रखते हुए विकास के प्रस्ताव बने ताकि पहाडि़यों का मूल स्वरूप बरकरार रखा जा सके। वरिष्ठ नगर नियोजक उदयपुर एस.के. श्रीमाली ने कहा कि नगरीय विकास और पर्यावरण में संतुलन आवश्यक है। मीरा गर्ल्स कॉलेज के प्रोफेसर दीपक माहेश्वरी ने कहा कि पहाडि़यों संरक्षण के लिये वैज्ञानिक शैली अपनायी जाये।
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सुखाडि़या विश्व विद्यालय के प्रोफेसर इशाक मोहम्मद कायमखानी ने कहा कि इतिहास से सबक लेते हुए पहाडियों का संरक्षण आवश्यक है। पहाडियों का संरक्षण न करने से ही विश्व में रोमन साम्राज्य का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। प्रन्यास सचिव श्री रामनिवास मेहता ने प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए उनसे अनुरोध किया कि वे अपने सुझाव लिखित रूप में विस्तार से भिजवायें ताकि उन्है पहाडियों के संरक्षण के लिये तैयार किये जा रहे प्रारूप में जोड़ा जा सके।
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बैठक में प्रन्यास की विशेषाधिकारी र्कीति राठौड़, भूमि अवाप्ति अधिकारी पुष्पेन्द्र सिंह शेखावत, अधीक्षण अभियन्ता आर.आर.हूड़ा, अधिशाषी अभियन्ता संजीव शर्मा, उप नगर नियोजक एच.एस.मेनारिया, इन्वेस्टिगेटर एम.एस. परिहार, सहायक नगर नियोजक ललित पूर्बिया, वरिष्ठ ड्राफ्टमैन अनिल चितौड़ा, भजनसिंह, तहसीलदार गोर्वधन सिंह झाला तथा कनिष्ठ अभियन्ता विकेश जाटव भी उपस्थित थे।
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