यहां लगेगा देश का पहला हाइब्रिड पावरहाउस ! हर मौसम में पैदा करेगा बिजली, ऐसे करेगा काम ?
Udaipur Times, Hydrogen Production Technology : बहुत जल्द भारत की स्वच्छ ऊर्जा यात्रा में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। गोवा देश के नवीकरणीय ऊर्जा भविष्य में अहम भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है। दरअसल, सीएसआईआर-राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (CSIR-NIO) गोवा के तट पर देश का पहला हाइब्रिड फ्लोटिंग रिन्यूएबल एनर्जी प्लेटफॉर्म विकसित करने की योजना बना रहा है। इस अनोखे प्रोजेक्ट में एक ही तैरते प्लेटफॉर्म पर सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन किया जाएगा। यह परियोजना भारत को स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ाने के साथ-साथ समुद्र आधारित ऊर्जा उत्पादन की नई संभावनाएं भी खोलेगी।
क्यों खास है यह हाइब्रिड प्लेटफॉर्म?
यह प्लेटफॉर्म समुद्र में स्थापित किया जाएगा, जहां एक ही ढांचे पर सोलर पैनल और विंड टर्बाइन दोनों लगाए जायेंगे। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जब धूप कम होगी, तब तेज हवाएं बिजली उत्पादन जारी रखेंगी और जब हवाएं कम होंगी, तब सोलर पैनल बिजली बनाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रणाली दिनभर और पूरे साल अधिक स्थिर और भरोसेमंद बिजली आपूर्ति सुनिश्चित कर सकती है।
मानसून के हिसाब से बदलेगा काम करने का तरीका
गोवा के समुद्र में बनने वाला यह प्लेटफॉर्म लचीला (फ्लेक्सिबल) होगा और मानसून की तेज हवाओं तथा ऊंची लहरों को भी झेल सकेगा। मानसून के दौरान जब सूरज की रोशनी कम हो जाती है, तब यह प्रणाली हवा और समुद्री लहरों की ताकत का इस्तेमाल कर बिजली बनाएगी। वहीं गर्मियों में सौर ऊर्जा इसका प्रमुख स्रोत होगी। यानी यह तकनीक मौसम के अनुसार खुद को ढालते हुए सालभर बिजली उत्पादन करने में सक्षम होगी।
पहले होगी टेस्टिंग
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस तकनीक को लागू करने से पहले एक छोटे प्लेटफॉर्म का निर्माण कर उसकी टेस्टिंग की जाएगी। यदि खराब मौसम की स्थिति बनती है तो इस प्लेटफॉर्म को सुरक्षा के लिए समुद्र किनारे के पास लाया जा सकेगा। आगे चलकर ऐसा स्थायी प्लेटफॉर्म विकसित किया जाएगा जो पूरे साल समुद्र में रहकर विभिन्न मौसम परिस्थितियों में काम कर सके।
समुद्र में स्थिर रखना सबसे बड़ी चुनौती
इस परियोजना की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती समुद्र में तैरते प्लेटफॉर्म को स्थिर बनाए रखना है। इसके लिए विशेष मूरिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे यह प्लेटफॉर्म समुद्र की बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को समायोजित कर सके।
वैज्ञानिकों के सामने ऐसी संरचना तैयार करने की चुनौती भी है जो समुद्र की तेज लहरों और तूफानी हवाओं को सह सके। इसलिए प्लेटफॉर्म को पूरी तरह कठोर नहीं बनाया जाएगा, ताकि लहरों के दबाव से उसे नुकसान न पहुंचे।
अगले चरण में बनेगी ग्रीन हाइड्रोजन
इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके अगले चरण में समुद्र के बीच ही ग्रीन हाइड्रोजन गैस बनाने की तकनीक जोड़ी जा सकती है।
दरअसल, समुद्र में उत्पादित बिजली को जमीन तक पहुंचाने के लिए बेहद महंगी केबल बिछानी पड़ती है। नई तकनीक के तहत समुद्री पानी से नमक अलग कर वहीं पर बिजली की मदद से ग्रीन हाइड्रोजन तैयार की जाएगी। इसके बाद इस गैस को टैंकों में भरकर उद्योगों और वाहनों तक पहुंचाया जा सकेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीन हाइड्रोजन भविष्य का स्वच्छ ईंधन साबित हो सकता है और इससे ऊर्जा परिवहन की लागत में भी भारी कमी आएगी।
भारत के हरित ऊर्जा लक्ष्यों को मिलेगा बल
गोवा स्थित CSIR-NIO इस परियोजना को केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि इसे एक रिसर्च प्लेटफॉर्म के रूप में भी विकसित किया जाएगा। यहां वैज्ञानिक भारतीय समुद्री परिस्थितियों में ऑफशोर रिन्यूएबल तकनीकों की क्षमता, टिकाऊपन और दक्षता का अध्ययन करेंगे।
यदि यह परियोजना सफल रहती है तो इसे देश के अन्य तटीय राज्यों में भी लागू किया जा सकता है। इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के नए रास्ते खुलेंगे। गोवा का यह हाइब्रिड फ्लोटिंग रिन्यूएबल एनर्जी प्लेटफॉर्म सिर्फ एक बिजली परियोजना नहीं, बल्कि भारत के हरित और आत्मनिर्भर ऊर्जा भविष्य की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
