बाढ़ में डूब जाता था घर, खाने तक के पड़ जाते थे लाले, अब सत्येंद्र ने अफसर बनकर रचा इतिहास

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बाढ़ में डूब जाता था घर, खाने तक के पड़ जाते थे लाले, अब सत्येंद्र ने अफसर बनकर रचा इतिहास 

Udaipur Times, Satyendra Pratap Success Story : कहते हैं कि सफलता का रास्ता कभी आसान नहीं होता। कुछ लोगों के लिए यह रास्ता सुविधाओं और संसाधनों से होकर गुजरता है, तो कुछ लोग बेहद मुश्किल परिस्थितियों के बीच अपने सपनों को पूरा करते हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के घाघरा तराई क्षेत्र के एक छोटे से गांव से निकलकर सत्येंद्र प्रताप सिंह ने भी संघर्ष से सफलता तक का ऐसा ही सफर तय किया है।

हर साल आने वाली बाढ़, पानी में डूबता घर, बर्बाद होती फसलें और परिवार की खराब आर्थिक स्थिति उनके जीवन का हिस्सा रही। कई बार हालात ऐसे बन जाते थे कि परिवार के सामने खाने तक का संकट खड़ा हो जाता था। इसके बावजूद सत्येंद्र ने पढ़ाई नहीं छोड़ी। पिता की खराब सेहत और परिवार की बढ़ती जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने अफसर बनने का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए लगातार मेहनत करते रहे।

कई असफलताओं के बाद आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और UPPSC 2024 में उन्होंने रैंक-1 हासिल की। इसके बाद उनका चयन जिला खाद्य विपणन अधिकारी (DFMO) के पद पर हुआ। उनकी कहानी उन युवाओं के लिए बड़ी प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।

बाढ़ के कहर से फसलें और घर दिनों हो जाते थे बर्बाद

सत्येंद्र प्रताप सिंह उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के घाघरा तराई क्षेत्र के एक छोटे से गांव के रहने वाले हैं। उन्होंने जोश टॉक्स के एक वीडियो में अपनी संघर्ष से सफलता तक की पूरी कहानी साझा की है। उन्होंने बताया कि उनके इलाके में हर साल बाढ़ की समस्या आती है। बाढ़ के कारण खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद हो जाती थीं और कई बार घर भी पानी में डूब जाता था। ऐसे हालात में परिवार के सामने रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो जाता था।

कई बार स्थिति इतनी खराब हो जाती थी कि घर में खाना बनाने और खाने तक की परेशानी होती थी। एक तरफ बाढ़ और खेती पर निर्भरता, दूसरी तरफ आर्थिक तंगी—इन परिस्थितियों में पढ़ाई करना आसान नहीं था। लेकिन सत्येंद्र ने इन मुश्किलों को अपने लक्ष्य के रास्ते में नहीं आने दिया।

2017 में दादाजी के निधन के बाद बढ़ गईं पारिवारिक जिम्मेदारियां

सत्येंद्र के संघर्ष का एक बड़ा दौर साल 2017 के बाद शुरू हुआ। इसी साल उनके दादाजी का निधन हो गया। इसके बाद परिवार की जिम्मेदारियां और बढ़ गईं। उनके पिता की तबीयत भी ठीक नहीं रहती थी, जिसकी वजह से परिवार की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती गई।

घर की जरूरतें पूरी करने के लिए उनके बड़े भाई को उत्तराखंड जाकर नौकरी करनी पड़ी। दूसरी ओर सत्येंद्र खेती में परिवार का हाथ बंटाते रहे। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया।

उनके सामने करियर के कई विकल्प नहीं थे, लेकिन उन्होंने प्रशासनिक सेवा में जाने का सपना देख लिया था। यही सपना धीरे-धीरे उनका लक्ष्य बन गया। उन्होंने तय कर लिया कि परिस्थितियां चाहे जितनी भी कठिन हों, उन्हें अफसर बनकर ही दम लेना है।

BTech का सपना नहीं हुआ पूरा, BA में लिया दाखिला

आर्थिक परेशानियों की वजह से सत्येंद्र अपनी पसंद के अनुसार BTech की पढ़ाई नहीं कर सके। संसाधनों की कमी के कारण उन्होंने BA में दाखिला लिया और अपनी पढ़ाई जारी रखी।

कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें परिवार की जिम्मेदारियों में भी हाथ बंटाना पड़ता था। खेती और पढ़ाई को साथ लेकर चलना उनके लिए आसान नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी।

सत्येंद्र के लिए पढ़ाई सिर्फ नौकरी पाने का जरिया नहीं थी। वह अपने परिवार की परिस्थितियों को बदलना चाहते थे। इसी सोच ने उन्हें लगातार आगे बढ़ने की ताकत दी।

UPSC में मिली असफलता, लेकिन नहीं मानी हार

सत्येंद्र ने सबसे पहले UPSC की परीक्षा की तैयारी की। उन्होंने परीक्षा दी, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने अपनी रणनीति पर दोबारा विचार किया और UPPSC की तैयारी पर फोकस करना शुरू किया।

साल 2023 में उन्हें एक और बड़ा झटका लगा। वह UPPSC मेंस परीक्षा में करीब 100 नंबर से पीछे रह गए। इस असफलता के बाद वह काफी निराश हुए। लंबे समय की मेहनत के बावजूद सफलता नहीं मिलने से उनका आत्मविश्वास भी प्रभावित हुआ।

हालांकि, इसी मुश्किल समय में उनकी मां ने उनका हौसला बढ़ाया। उन्होंने सत्येंद्र को समझाया कि एक असफलता का मतलब यह नहीं है कि मंजिल हासिल नहीं की जा सकती। मां की बातों से उन्हें दोबारा मेहनत करने की प्रेरणा मिली।

रणनीति बदली और मेंस परीक्षा पर किया फोकस

असफलता के बाद सत्येंद्र ने अपनी तैयारी का तरीका बदला। उन्होंने अपनी गलतियों को पहचाना और खास तौर पर मेंस परीक्षा के उत्तर लेखन पर काम किया।

उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि पिछली परीक्षा में कहां कमी रह गई थी। इसके बाद पढ़ाई की रणनीति में बदलाव किया और लगातार अभ्यास किया। उनका फोकस सिर्फ ज्यादा पढ़ने पर नहीं, बल्कि सही तरीके से पढ़ाई करने और परीक्षा की जरूरत के हिसाब से तैयारी करने पर था।

इस मेहनत का असर उनकी आगे की परीक्षाओं में भी दिखाई दिया। उन्होंने एक के बाद एक कई प्री-एग्जाम क्लियर किए और खुद को साबित किया।

6 प्री-एग्जाम क्लियर कर बढ़ाया आत्मविश्वास

सत्येंद्र ने करीब एक साल के दौरान अपनी तैयारी को पूरी तरह नए तरीके से आगे बढ़ाया। उन्होंने लगातार मेहनत की और एक के बाद एक 6 प्री-एग्जाम क्लियर किए।

हर सफलता ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। जिस अभ्यर्थी को कुछ समय पहले मेंस परीक्षा में असफलता का सामना करना पड़ा था, वही अब अपनी कमियों को दूर करके लगातार आगे बढ़ रहा था।

उन्होंने यह साबित किया कि प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में असफलता के बाद रणनीति बदलना और अपनी गलतियों से सीखना कितना महत्वपूर्ण है।

UPPSC 2024 में हासिल की रैंक-1

आखिरकार वह दिन आया, जिसका सत्येंद्र और उनके परिवार को लंबे समय से इंतजार था। UPPSC 2024 के रिजल्ट में सत्येंद्र प्रताप सिंह ने रैंक-1 हासिल की।

यह सिर्फ एक परीक्षा में मिली सफलता नहीं थी, बल्कि उन तमाम मुश्किल परिस्थितियों पर जीत थी, जिनका सामना उन्होंने बचपन से किया था। जिस घर में कभी बाढ़ का पानी भर जाता था और परिवार के सामने खाने तक की समस्या खड़ी हो जाती थी, उसी परिवार का बेटा अब प्रशासनिक अधिकारी बनने जा रहा था।

उनकी इस सफलता ने परिवार की मुश्किलों को पीछे छोड़कर एक नई शुरुआत का रास्ता खोल दिया।

DFMO बनकर हासिल किया अपने सपने को साकार 

UPPSC में रैंक-1 हासिल करने के बाद सत्येंद्र का चयन जिला खाद्य विपणन अधिकारी (DFMO) के पद पर हुआ। घाघरा तराई जैसे क्षेत्र से निकलकर इस मुकाम तक पहुंचना उनके लिए बड़ी उपलब्धि है।

उनकी सफलता की कहानी खास इसलिए भी है क्योंकि उन्होंने सुविधाओं और संसाधनों के अभाव में तैयारी की। खेती, परिवार की जिम्मेदारियों और आर्थिक चुनौतियों के बीच उन्होंने अपने लक्ष्य पर फोकस बनाए रखा।

तराई क्षेत्र के युवाओं के लिए बने प्रेरणा

सत्येंद्र की कहानी आज उनके क्षेत्र के उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो आर्थिक या पारिवारिक परेशानियों के कारण अपने सपनों को छोड़ने का विचार करते हैं। उनकी सफलता बताती है कि संसाधनों की कमी मुश्किल जरूर पैदा कर सकती है, लेकिन मजबूत इरादा और सही रणनीति मंजिल तक पहुंचने का रास्ता खोल सकती है। 

सत्येंद्र का कहना है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, अगर इंसान अपने लक्ष्य को लेकर दृढ़ रहे और लगातार मेहनत करता रहे तो सफलता हासिल की जा सकती है। ऐसे में अफसर बनने के बाद भी सत्येंद्र ने अपनी तैयारी को पूरी तरह खत्म नहीं किया है। वह UPSC की तैयारी जारी रखे हुए हैं। उनकी कहानी संघर्ष, असफलता, परिवार के सहयोग और लगातार मेहनत के जरिए सफलता हासिल करने की मिसाल है।

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