इन शहरों की बदली तस्वीर ! जमीन की बढ़ी कीमतें, ये शहर बन रहे नए औद्योगिक केंद्र
Udaipur Times, New Delhi : देश के बड़े शहरों में औद्योगिक जमीन की उपलब्धता लगातार चुनौती बन रही है। ऐसे में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अब तेजी से टियर-2 और टियर-3 शहरों की ओर बढ़ रहा है। JLL की रिपोर्ट ‘Great Places of Manufacturing in India 2.0’ के मुताबिक, बद्दी, धोलेरा और भुवनेश्वर जैसे उभरते औद्योगिक शहर अब मैन्युफैक्चरिंग के साथ-साथ रियल एस्टेट निवेश के लिए भी महत्वपूर्ण केंद्र बनते जा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पारंपरिक औद्योगिक केंद्रों में जमीन और संसाधनों की उपलब्धता पर दबाव बढ़ने से नए शहरों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है।
वर्तमान में टियर-2 और टियर-3 शहर बन रहे नए औद्योगिक केंद्र
JLL की रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा औद्योगिक केंद्रों में जमीन की उपलब्धता और संसाधनों की क्षमता सीमित होती जा रही है। इसके चलते टियर-2 और टियर-3 शहर अगले औद्योगिक विकास केंद्र के रूप में उभर रहे हैं। राज्य सरकारें इन शहरों में अलग-अलग उद्योगों की जरूरत के हिसाब से सेक्टर आधारित इंडस्ट्रियल पार्क विकसित कर रही हैं।
कंपनियों और निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कैपिटल सब्सिडी, टैक्स हॉलिडे और सिंगल विंडो क्लीयरेंस जैसी सुविधाएं भी दी जा रही हैं। इसके अलावा डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क और बंदरगाहों व हवाई अड्डों तक बेहतर हाईवे कनेक्टिविटी ने इन शहरों की कनेक्टिविटी को मजबूत किया है। इससे बड़े औद्योगिक केंद्रों के मुकाबले छोटे शहरों की लोकेशन से जुड़ी कमियां भी काफी हद तक कम हुई हैं।
मैन्युफैक्चरिंग लीजिंग में तेजी
रिपोर्ट में दिए आंकड़ों के मुताबिक, भारत में ग्रॉस मैन्युफैक्चरिंग लीजिंग एब्जॉर्प्शन में पिछले कुछ वर्षों में तेज वृद्धि देखने को मिली है। 2019 में यह 4.5 मिलियन वर्ग फुट था, जो 2021 में 3.9 मिलियन वर्ग फुट रहा। इसके बाद 2025 में यह बढ़कर 19.2 मिलियन वर्ग फुट हो गया। 2026 की दूसरी तिमाही तक मैन्युफैक्चरिंग लीजिंग एब्जॉर्प्शन 10.2 मिलियन वर्ग फुट तक पहुंच चुका है। रिपोर्ट में 2030 के लिए 46 मिलियन वर्ग फुट का अनुमानित लक्ष्य बताया गया है।
ग्रेटर नोएडा औरंगाबाद समेत कईं शहर बन रहे हॉटस्पॉट
रिपोर्ट के अनुसार, धोलेरा, ग्रेटर नोएडा, औरंगाबाद, भुवनेश्वर और बद्दी जैसे शहर आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग जरूरतों के मुताबिक तैयार किए जा रहे हैं। इन शहरों में उद्योगों के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे और सुविधाओं का विकास किया जा रहा है। इससे कंपनियों के लिए बड़े और आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित करना आसान हो रहा है। साथ ही, इन क्षेत्रों में औद्योगिक रियल एस्टेट की मांग भी बढ़ रही है।
कैपेक्स-लाइट मॉडल पर बढ़ा भरोसा
भारत का मैन्युफैक्चरिंग रियल एस्टेट सेक्टर अब प्रीमियम इंफ्रास्ट्रक्चर और बड़े फैसिलिटी फुटप्रिंट की ओर बढ़ रहा है। इसी के साथ लीज्ड मैन्युफैक्चरिंग स्पेस का कैपेक्स-लाइट मॉडल भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इस मॉडल में कंपनियों को जमीन खरीदने और पूरी इमारत तैयार करने में बड़ा शुरुआती निवेश नहीं करना पड़ता।
रियल एस्टेट डेवलपर्स जमीन और निर्माण की लागत उठाते हैं, जबकि कंपनियां अपनी जरूरत के मुताबिक तैयार या विकसित स्पेस को लीज पर ले सकती हैं। इससे कंपनियों का शुरुआती पूंजीगत खर्च कम होता है और वे अपने मुख्य कारोबार पर ज्यादा ध्यान दे पाती हैं। लीज्ड स्पेस में जरूरत के अनुसार कस्टमाइजेशन की सुविधा भी मिलती है। इसके अलावा यह मॉडल निर्माण में होने वाली देरी और रियल एस्टेट बाजार की अस्थिरता से जुड़े जोखिम को भी कम करने में मदद करता है।
ग्रेड-ए मैन्युफैक्चरिंग स्पेस की बढ़ रही है मांग
JLL की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनियों के बीच बेहतर सुविधाओं वाले ग्रेड-ए मैन्युफैक्चरिंग स्पेस की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि ऐसे तैयार या उच्च गुणवत्ता वाले स्पेस में कंपनियां अपेक्षाकृत कम समय में अपना काम शुरू कर सकती हैं। 2019 में रेडी-बिल्ट स्पेस की मांग 59 फीसदी थी, जो 2025 में बढ़कर 76 फीसदी हो गई। इंजीनियरिंग, ऑटो और सेमीकंडक्टर समेत इलेक्ट्रॉनिक्स गुड्स जैसे सेक्टर में क्वालिटी मैन्युफैक्चरिंग स्पेस की मांग बढ़ने से ग्रेड-ए स्पेस का एब्जॉर्प्शन भी तेजी से बढ़ा है।
इस तरह बड़े शहरों में जमीन की कमी और बढ़ती लागत के बीच टियर-2 और टियर-3 शहर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए नए विकल्प के रूप में तेजी से उभर रहे हैं। आने वाले वर्षों में बेहतर कनेक्टिविटी, इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर और लीज्ड स्पेस के बढ़ते चलन से इन शहरों की भूमिका और मजबूत होने की उम्मीद है।