पंक्चर की दुकान चलाने वाली मां का बेटा बना IAS अफसर, कड़ी मेहनत से पहले प्रयास में क्रैक किया UPSC
Udaipur Times, Success Story of IAS Varun Baranwal : मां के हौसले अगर बुलंद हो तो बच्चे हर ऊंचाईयों को छू सकते हैं। उनके पक्के हौसलों के आगे हर चुनौती झुक जाती है। आज एक ऐसी ही कहानी हम आपके सामने पेश करने जा रहे हैं। ये कहानी है, महाराष्ट्र के छोटे से शहर से आने वाले वरुण बरनवाल की मेहनत और उनकी मां हौसले की। IAS वरुण बरनवाल की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो गरीब परिवार से आते हैं और उनकी आंखों में बड़े-बड़े सपने होते हैं।

परिवार के एकमात्र कमाने वाले पिता का हो गया निधन
वरुण बरनवाल महाराष्ट्र के पालघर जिले के बोइसर नामक एक छोटे से कस्बे के रहने वाले थे। गरीबी से जूझ रहे परिवार में उन्हें छोटी-छोटी चीजों के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ता था। वरुण के पिता की साइकिल पंचर ठीक करने की दुकान थी, जिससे वे बड़ी मुश्किल से परिवार का गुजारा चलाते थे। फिर भी, वे हमेशा इस बात का पूरा ध्यान रखते थे कि उनके बेटे की पढ़ाई में कोई बाधा न आए। वरुण बचपन से ही एक प्रतिभाशाली छात्र थे। लेकिन 2006 में, 10वीं की परीक्षा समाप्त होने के ठीक तीन दिन बाद, 16 वर्षीय वरुण के जीवन में एक भयानक त्रासदी आ पड़ी। लंबे समय से बीमार रहने के बाद, परिवार के एकमात्र कमाने वाले उनके पिता का निधन हो गया।

डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले वरुण को साइकिल के टायर ठीक करने के औजार उठा लिए
10वीं क्लास में वरुण फर्स्ट डिवीजन से पास हुए थे। वह अपनी इस उपलब्धि को सबके साथ खुशी-खुशी बांटने चाहते थे। लेकिन तभी वरुण के मन में ख्याल आया कि "अब तुम क्या करोगे?" मानो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई हो। डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले वरुण को उसके रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने पढ़ाई छोड़ने की सलाह दी। सबने उसे अपने पिता की टायर की दुकान संभालने और मां-बाप का सहारा बनने को कहा। उस समय वरुण ने सबकी बात मान ली, किताबें एक तरफ रख दीं और साइकिल के टायर ठीक करने के औजार उठा लिए।
बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ मां ने पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी भी अपने कंधों पर उठा ली
वरुण स्कूल जाने के बजाय हर सुबह उठकर दुकान पर जाकर अपने परिवार के लिए पैसे कमाते थे। उच्च शिक्षा का उनका सपना हकीकत से बहुत दूर था। उनकी मां अपने बेटे का दुख सहन नहीं कर पा रही थी। मां ने ठान लिया कि चाहे कितना भी खर्चा हो, वह अपने बेटे को पढ़ाएगी। उन्होंने वरुण को पढ़ने के लिए कहा और खुद भी टायर पंचर ठीक करने की दुकान पर जाने लगी। बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ मां ने पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी भी अपने कंधों पर उठा ली। अगर वह दुकान से 100 रुपये कमाती, तो 50 रुपये परिवार के खर्चों में लगा देती और बाकी 50 रुपये बच्चों की शिक्षा के लिए बचा लेती।
एमबीबीएस के भारी खर्च के कारण उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी
स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद वरुण ने मेडिकल की पढ़ाई के लिए कॉलेज में दाखिला लिया। लेकिन एमबीबीएस के भारी खर्च के कारण उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। हालांकि, पिता के दोस्तों और शिक्षकों से मिली आर्थिक मदद से उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और डिग्री पूरी करने के बाद एक इंटरनेशनल कंपनी में अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी मिल गई। लेकिन किस्मत ने उन्हें कहीं और ही मोड़ दिया।

कोचिंग से किया वादा निभाया पहली बार में ही पास कर ली UPSC सीएसई की परीक्षा
एक निजी कंपनी में काम करते हुए वरुण ने सिविल सेवा में शामिल होने का फैसला किया। उन्होंने UPSC परीक्षा की तैयारी के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी। कई लोग उनके इस फैसले से सहमत नहीं थे। लेकिन वरुण को खुद पर भरोसा था। उस समय कोचिंग का खर्च उठाना उनके लिए संभव नहीं था। फिर भी, वे एक संस्थान में गए और उनसे वादा किया कि अगर उन्हें मुफ्त में पढ़ने का मौका दिया जाए, तो वे पहली ही कोशिश में UPSC परीक्षा पास कर लेंगे और उन्होंने अपना वादा निभाया और वरुण बरनवाल UPSC सीएसई 2016 परीक्षा में 32वीं (AIR) रैंक हासिल करके IAS अधिकारी बन गए।
