चिड़ियों का बीट बेचकर बना था दुनिया का सबसे अमीर देश, आज है दाने-दाने को मोहताज

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 चिड़ियों का बीट बेचकर बना था दुनिया का सबसे अमीर देश, आज है दाने-दाने को मोहताज

Udaipur Times, Nauru Economy History : आज हम आपको दुनिया एक ऐसे देश के बारें में बताने जा रहे हैं जिसे कार के जरिए मात्र एक घंटे में पूरा घूमा जा सकता है। आश्चर्य की सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह देश हमारे देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से भी कई गुना छोटा है। एक ऐसा वक्त ऐसा था जब इस छोटे से देश में रहने वाले लोग अमेरिका के लोगों से भी कई गुना अमीर थे।

नाउरु दुनिया का तीसरा सबसे छोटा देश

हम जिस देश की बात कर रहे हैं उसका नाम नाउरु है। यह प्रशांत महासागर में स्थित छोटा सा टापू है। नाउरू का क्षेत्रफल मात्र 21 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है।  नाउरु भी भारत की तरह ही स्वतंत्र और संप्रभू देश है. यह कोई द्वीपों का समूह नहीं है बल्कि यह केवल एक ही अकेला द्वीप है जो गहरे प्रशांत महासागर के बीच में उभरा हुआ है।

यह माइक्रोनेशियाई क्षेत्र में का द्वीप है। चूंकि यह समंदर के बीचों-बीच काफी अकेला टापू है। इसलिए ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे बड़े देशों से इसकी दूरी काफी ज्यादा है। नाउरु का सबसे नजदीकी पड़ोसी देश किरिबाती का बानाबा द्वीप है, जो इससे लगभग 300 किलोमीटर पूर्व में है। नाउरु की आबादी मात्र 10 से 12 हजार है। यह दुनिया का तीसरा सबसे छोटा देश है।

चिड़ियों की बीट ने पूरे देश को बना दिया अमीर 

इस देश के हर नागरिक की इनकम दुनिया में दूसरे नंबर पर थी। इस देश की अर्थव्यवस्था किसी तेल के भंडार या फिर सोने-चांदी के कारण नहीं थी बल्कि चिड़ियों की बीट ने पूरे देश को अमीर बना रखा था। महासागर में स्थित इस टापू में पक्षियों का रैन बसरा था।

लाखों साल तक यहां पक्षियां आती रही है और उन्होंने अरबों टन यहां बीट छोड़ी। इस बीट यानी पक्षियों के मल से फॉस्फेट बनने लगा। यह प्रकृति की एक अद्भुत और लाखों साल पुरानी रासायनिक प्रक्रिया है।

नाउरु में लाखों सालों तक इंसानी आबादी नहीं थी लेकिन गनेट और फ्रिगेटबर्ड जैसी पंक्षियों का प्रमुख बसेरा था। लाखों पक्षियों ने सदियों तक इस द्वीप पर अपनी बीट जमा की। इस संचित सूखी बीट को वैज्ञानिक भाषा में गुआनो कहा जाता है। गुआनो नाइट्रोजन और फॉस्फोरस का मिश्रण है। उस समय यहां बहुत बारिश होती थी। 

बारिश के पानी ने गुआनो में मौजूद घुलनशील फॉस्फेट को घोल दिया जो टापू पर पहले से मौजूद कोरल और चूना-पत्थर के साथ प्रतिक्रिया कर नीचे दबता गया। इस रिएक्शन के कारण द्वीप पर अथाह कैल्शियम कार्बोनेट, कैल्शियम फॉस्फेट और फॉस्फोरिक एसिड बनने लगा।

वक्त के साथ यह इतना कठोर हो गया कि इसने चट्टानों का रूप ले लिया जिसे फॉस्फेट रॉक कहा जाने लगा। यही नाउरु की समृद्धि का प्रतीक बन गया।

नाउरु की तुलना सऊदी अरब से होने लगी 

ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और ब्रिटेन जैसे देश ने नौरू से बड़े स्तर पर फॉस्फेट की खरीदारी करते थे। 1970 और 80 के दशक में देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती है और यहां के लोगों की प्रति व्यक्ति आय इतनी ज्यादा होती है कि इनकी तुलना सऊदी अरब जैसे अमीर देशों से होने लगती हैं।

बेहिसाब खनन के कारण तबाह हुआ देश 

बेहिसाब खनन की वजह से कुछ ही सालों के भीतर नौरू के फॉस्फेट के भंडार लगभग खत्म होने लगे। इस देश की जमीन इतनी ज्यादा खराब हो गई कि 80% हिस्सा किसी काम का नहीं रहा और देश की अर्थव्यवस्था भी बर्बाद होने लगी।यहां मौजूद सभी पेड़-पौधे और हरियाली बंजर भूमि में बदल गए।

 इसलिए वहां कोई खेती लायक जमीन भी नहीं बची। साल 1990 के अंत तक फॉस्फेट के भंडार लगभग पूरी तरह समाप्त हो गए। देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई। देश पर कर्ज बढ़ता गया। अब नाउरु के पास देश चलाने के लिए पैसा नहीं बचा था।

सरकार की विदेशों में स्थित कई संपत्तियां जब्त कर ली गईं। खेती नहीं होने के कारण अधिकांश लोगों को पैकेटबंद खाने पर जीना पड़ता है। इससे लोगों में मोटापा चरम पर है। आज यह देश खाने-खाने के लिए मोहताज है। दूसरे देशों की सहायता और विदेशी कर्ज पर यहां के लोग अपना जीवन चला रहे हैं।

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