आपके भी पुराने फोन और TV में छिपा है करोड़ों का खजाना ! सरकार ने बनाई इसे लेकर नई स्कीम ?
Udaipur Times, NEW E-WASTE POLICY : आपका पुराना मोबाइल फोन, खराब लैपटॉप, बेकार टीवी या इस्तेमाल के लायक न बचा चार्जर भले ही कबाड़ लगे, लेकिन इनमें छिपी कीमती धातुएं इन्हें 'शहरी सोना' (Urban Mine) बना देती हैं। यही वजह है कि दिल्ली सरकार अब ई-वेस्ट और खासकर पुरानी बैटरियों के सुरक्षित संग्रह और रीसाइक्लिंग पर बड़ा फोकस कर रही है। नई दिल्ली ईवी पॉलिसी 2026 (DELHI GOVERNMENT'S NEW E-WASTE POLICY 2026) के तहत सरकार ने बैटरी वेस्ट मैनेजमेंट के लिए विशेष ढांचा तैयार किया है, ताकि भविष्य में बढ़ने वाले ई-वेस्ट संकट से समय रहते निपटा जा सके।
ई-वेस्ट (E-WASTE) क्या होता है?
ई-वेस्ट यानी ऐसे इलेक्ट्रॉनिक और इलेक्ट्रिकल उपकरण जो अब इस्तेमाल के लायक नहीं रहे। इनमें मोबाइल फोन, लैपटॉप, कंप्यूटर, टीवी, फ्रिज, एसी, चार्जर, बैटरियां और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान शामिल हैं। अगर इन्हें सामान्य कचरे की तरह फेंक दिया जाए तो इनमें मौजूद सीसा (Lead), कैडमियम, क्रोमियम और अन्य जहरीले तत्व मिट्टी, पानी और हवा को प्रदूषित कर सकते हैं।
बेकार फोन-टीवी क्यों हैं इतने कीमती?
विशेषज्ञों के मुताबिक पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में सोना, चांदी, तांबा, एल्यूमिनियम, लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसी बहुमूल्य धातुएं मौजूद होती हैं। इन्हें वैज्ञानिक तरीके से निकालकर दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे नई खनन गतिविधियों की जरूरत कम होती है और पर्यावरण को भी फायदा मिलता है।
दिल्ली सरकार की नई योजना क्या है?
नई ईवी पॉलिसी 2026 (DELHI GOVERNMENT'S NEW E-WASTE POLICY 2026) के तहत दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) को पुरानी बैटरियों के संग्रह, भंडारण, परिवहन और रीसाइक्लिंग के लिए मानक प्रक्रिया (SOP) तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है। यह व्यवस्था बैटरी वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2022 के अनुरूप होगी, जिसके तहत बैटरी बनाने वाली कंपनियों को इस्तेमाल हो चुकी बैटरियां वापस लेकर उनका रीसाइक्लिंग कराना अनिवार्य है।
भारत में तेजी से बढ़ रहा है ई-वेस्ट
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ई-वेस्ट उत्पादक देश बन चुका है। वित्त वर्ष 2023-24 में देश में करीब 38 लाख मीट्रिक टन (3.8 MMT) ई-वेस्ट पैदा हुआ। वहीं केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार 2019-20 में जहां ई-वेस्ट 10.1 लाख मीट्रिक टन था, वह 2023-24 में बढ़कर 17.51 लाख मीट्रिक टन हो गया। हालांकि इसका बड़ा हिस्सा अभी भी अनौपचारिक सेक्टर में असुरक्षित तरीके से नष्ट किया जाता है।
ईवी बैटरियां भी बनेंगी बड़ी चुनौती
देश में इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या बढ़ने के साथ आने वाले वर्षों में बड़ी मात्रा में लिथियम-आयन बैटरियां भी बेकार होंगी। यदि इनका वैज्ञानिक तरीके से निपटान नहीं किया गया तो यह पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। इसलिए दिल्ली सरकार अभी से बैटरी रीसाइक्लिंग सिस्टम तैयार कर रही है।
सिर्फ कचरा नहीं, करोड़ों डॉलर का खजाना
विशेषज्ञों के अनुसार भारत के ई-वेस्ट में करीब 6 अरब डॉलर मूल्य की धातुएं मौजूद हैं, लेकिन मौजूदा तकनीक से केवल लगभग 3.6 अरब डॉलर मूल्य की सामग्री ही निकाली जा रही है। बेहतर रीसाइक्लिंग व्यवस्था बनने पर यह संसाधन देश की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण दोनों के लिए बड़ा लाभ साबित हो सकता है।
क्यों है यह पहल अहम?
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली की यह पहल केवल इलेक्ट्रिक वाहनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में बड़ा कदम है, जहां आज का बेकार इलेक्ट्रॉनिक सामान कल का कच्चा माल बन सकेगा। यदि यह मॉडल सफल रहता है तो दूसरे राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है।
