चंडीगढ़ से मनाली तक अब जाम की होगी छुट्टी ! इस फोरलेन परियोजना से लोगों को मिलेगा बड़ा फायदा

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चंडीगढ़ से मनाली तक अब जाम की होगी छुट्टी ! इस फोरलेन परियोजना से लोगों को मिलेगा बड़ा फायदा 

Udaipur Times, New Delhi : कीरतपुर-मनाली फोरलेन परियोजना ने हिमाचल की सड़क कनेक्टिविटी को नई रफ्तार दी है। सुरंग निर्माण में न्यू आस्ट्रियन टनलिंग मेथड यानी NATM तकनीक के इस्तेमाल से पहाड़ी और संवेदनशील इलाकों में सफर ज्यादा सुरक्षित और सुगम हुआ है। हिमाचल प्रदेश के दुर्गम और संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में सफर अब पहले के मुकाबले ज्यादा आसान और सुरक्षित हो गया है। कीरतपुर-मनाली फोरलेन परियोजना ने प्रदेश की कनेक्टिविटी की तस्वीर बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है।

इस परियोजना के तहत तैयार किए गए फोरलेन मार्ग और सुरंगों ने कई ऐसे मुश्किल हिस्सों को पार करना आसान बनाया है, जहां पहले यात्रियों को लंबे समय तक खतरनाक रास्तों और भूस्खलन के जोखिम के बीच सफर करना पड़ता था। इस बदलाव में सुरंग निर्माण की आधुनिक तकनीक न्यू आस्ट्रियन टनलिंग मेथड यानी NATM की अहम भूमिका रही है। इस तकनीक की मदद से पहाड़ की बदलती भूगर्भीय परिस्थितियों को समझते हुए सुरंग निर्माण का काम आगे बढ़ाया जाता है। इसके चलते चंडीगढ़ से मनाली के बीच सफर का समय करीब 10 घंटे से घटकर महज साढ़े पांच घंटे रह गया है।

पहाड़ की प्राकृतिक ताकत को ही बनाया सुरंग की ढाल

हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं अपेक्षाकृत युवा और भूगर्भीय रूप से संवेदनशील मानी जाती हैं। ऐसे क्षेत्रों में सुरंग बनाना आसान नहीं होता, क्योंकि खुदाई के दौरान चट्टानों के खिसकने और भूगर्भीय दबाव जैसी चुनौतियां सामने आती रहती हैं। NATM तकनीक की खासियत यही है कि इसमें पहाड़ से सीधे मुकाबला करने के बजाय उसकी प्राकृतिक मजबूती का इस्तेमाल किया जाता है। सुरंग की खुदाई के दौरान चट्टानों की संरचना और आसपास की भूगर्भीय स्थिति का लगातार वैज्ञानिक तरीके से विश्लेषण किया जाता है। 

स्थिति के मुताबिक सुरंग के भीतर सपोर्ट सिस्टम तैयार किया जाता है। यानी जहां जितने सपोर्ट की जरूरत होती है, वहां उसी हिसाब से व्यवस्था की जाती है। इससे अचानक बदलने वाले भूगर्भीय दबाव से निपटने में मदद मिलती है और सुरंग निर्माण को अपेक्षाकृत सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है।

टनल बोरिंग मशीन के अनुभव से मिली बड़ी सीख

पर्वतीय इलाकों में सुरंग बनाने के लिए टनल बोरिंग मशीन यानी TBM का इस्तेमाल भी किया गया है, लेकिन हर जगह यह तकनीक अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी। पार्वती प्रोजेक्ट-द्वितीय के दौरान करीब 150 करोड़ रुपये की लागत वाली TBM मशीन पहाड़ के भीतर फंस गई थी और उसे आज तक बाहर नहीं निकाला जा सका। 

इस अनुभव ने पर्वतीय क्षेत्रों में सुरंग निर्माण के लिए अधिक लचीली तकनीक की जरूरत को सामने रखा। इसके बाद सुरंग विशेषज्ञ हिमांशु कपूर और उनकी टीम ने बदलती भूगर्भीय परिस्थितियों के हिसाब से काम करने वाली NATM तकनीक पर भरोसा जताया। इस तकनीक में सुरंग निर्माण के दौरान पहाड़ की स्थिति के अनुसार लगातार बदलाव किए जा सकते हैं। यही वजह है कि हिमालय जैसे संवेदनशील इलाके में इसे उपयोगी तकनीक माना गया।

खतरनाक मोड़ों और भूस्खलन वाले इलाकों से मिली राहत

कीरतपुर-मनाली फोरलेन परियोजना का सबसे बड़ा असर उन हिस्सों में दिखाई देता है, जहां पहले यात्रियों को खतरनाक चढ़ाई, उतराई और भूस्खलन वाले क्षेत्रों से होकर गुजरना पड़ता था।स्वारघाट की खतरनाक चढ़ाई-उतराई और हणोगी का भूस्खलन जोन लंबे समय से यात्रियों के लिए चुनौती बने हुए थे। 

फोरलेन परियोजना और सुरंगों के निर्माण के बाद इन मुश्किल हिस्सों को पार करने का तरीका काफी बदल गया है। कीरतपुर से नाचगला तक 6,800 मीटर लंबी छह सुरंगों का निर्माण किया गया है। इनमें स्वारघाट-कैंचीमोड़ की 3,600 मीटर लंबी जुड़वां सुरंग भी शामिल है। इन सुरंगों के जरिए पहाड़ी रास्तों के कई कठिन हिस्सों को बायपास करना संभव हुआ है।

मंडी शहर को भी भारी ट्रैफिक से मिलेगी राहत

परियोजना के तहत मंडी बाईपास के मलोरी क्षेत्र में बनाई गई चार सुरंगों ने मंडी शहर के भीतर से गुजरने वाले भारी ट्रैफिक को कम करने में मदद की है। इससे शहर के अंदर वाहनों का दबाव घटाने और यातायात को सुचारु बनाने में मदद मिली है। इसी तरह दयोड़ से औट तक 10 सुरंगों के जरिए वाहनों की आवाजाही हो रही है। 

पहाड़ों में सुरंगों के इस नेटवर्क ने कई घुमावदार और कठिन हिस्सों को पार करने की जरूरत कम की है। इससे यात्रियों के लिए सफर पहले की तुलना में ज्यादा सुगम हुआ है और लंबी दूरी तय करने में लगने वाला समय भी कम हुआ है।

30 किलोमीटर लंबी परियोजना में 19 सुरंगों का होगा निर्माण

परियोजना के तहत करीब 30 किलोमीटर लंबे हिस्से में 19 सुरंगों का निर्माण किया गया है। इनके निर्माण में करीब 2.50 लाख टन सीमेंट और 2.00 लाख टन स्टील का इस्तेमाल हुआ है। पंडोह बाईपास, चार मील और नौ मील समेत 12 अन्य सुरंगें भी परियोजना का हिस्सा हैं। इन सुरंगों के निर्माण से पहाड़ी क्षेत्र में सड़क को ज्यादा सीधा और सुविधाजनक बनाने में मदद मिली है।इतने बड़े स्तर पर सुरंगों का निर्माण हिमालय जैसे कठिन भूभाग में इंजीनियरिंग की बड़ी चुनौती रहा है। इसके लिए भूगर्भीय परिस्थितियों को समझने के साथ-साथ निर्माण तकनीक में भी लगातार बदलाव करना पड़ा।

पर्यटन और स्थानीय कारोबार को भी मिलेगी रफ्तार

बेहतर सड़क कनेक्टिविटी का असर सिर्फ यात्रियों के सफर तक सीमित नहीं है। हिमाचल प्रदेश में पर्यटन, बागवानी और स्थानीय व्यापार के लिए सड़क संपर्क बेहद महत्वपूर्ण है। सफर का समय कम होने और कठिन पहाड़ी हिस्सों में आवाजाही आसान होने से पर्यटकों के लिए मनाली और आसपास के क्षेत्रों तक पहुंचना सुविधाजनक हुआ है। वहीं स्थानीय स्तर पर सामान की आवाजाही भी बेहतर होने की उम्मीद है। बागवानी से जुड़े क्षेत्रों के लिए भी बेहतर सड़क संपर्क महत्वपूर्ण है, क्योंकि कृषि और बागवानी उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने में परिवहन की बड़ी भूमिका होती है।

प्रकृति के साथ तालमेल का मॉडल

कीरतपुर-मनाली फोरलेन परियोजना में सुरंग निर्माण ने यह दिखाया है कि हिमालय जैसे संवेदनशील भूभाग में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए सिर्फ आधुनिक मशीनों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। पहाड़ की प्राकृतिक और भूगर्भीय परिस्थितियों को समझकर निर्माण तकनीक का इस्तेमाल करना भी उतना ही जरूरी है। NATM तकनीक इसी सोच पर आधारित है, जिसमें पहाड़ की स्थिति का लगातार अध्ययन कर उसी के अनुसार सुरंग को सपोर्ट दिया जाता है। 

इस वजह से हिमालयी क्षेत्र में सुरंग निर्माण के लिए यह तकनीक एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में सामने आई है। कुल मिलाकर, कीरतपुर-मनाली फोरलेन परियोजना ने हिमाचल की सड़क कनेक्टिविटी को नई दिशा दी है। चंडीगढ़ से मनाली के सफर का समय करीब 10 घंटे से घटकर साढ़े पांच घंटे रहना इस बदलाव का बड़ा उदाहरण है। सुरंगों और फोरलेन सड़क के जरिए न सिर्फ यात्रा आसान हुई है, बल्कि पर्यटन, बागवानी और स्थानीय व्यापार के लिए भी बेहतर कनेक्टिविटी का रास्ता तैयार हुआ है।

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