हाईकोर्ट बेंच की मांग के समर्थन में वाहन रैली से शक्ति प्रदर्शन
उदयपुर में हाईकोर्ट बेंच की मांग को लेकर चल रहे अधिवक्ताओ द्वारा चलाए जा रहे जन आंदोलन के तहत सोमवार सुबह 9ः00 बजे विभिन्न स्वयंसेवी संगठन सामाजिक संगठन राजनीतिक संगठन व्यापारिक संगठन आर्थिक जगत के संगठन एवं विभिन्न जनप्रतिनिधियों के सहयोग से शक्ति प्रदर्शन करते हुए विशाल वाहन रैली का आयोजन किया गया। यह रैली सुबह 9ः00 बजे जिला न्यायालय परिसर के मुख्य द्वार से रवाना होकर दिल्ली गेट से बापू बाजार, सूरज पोल, अस्थल मंदिर, मुखर्जी चौक, घंटाघर, हाथीपोल, चेतक सर्कल होते हुए पुनः जिला न्यायालय परिसर
उदयपुर में हाईकोर्ट बेंच की मांग को लेकर चल रहे अधिवक्ताओ द्वारा चलाए जा रहे जन आंदोलन के तहत सोमवार सुबह 9ः00 बजे विभिन्न स्वयंसेवी संगठन सामाजिक संगठन राजनीतिक संगठन व्यापारिक संगठन आर्थिक जगत के संगठन एवं विभिन्न जनप्रतिनिधियों के सहयोग से शक्ति प्रदर्शन करते हुए विशाल वाहन रैली का आयोजन किया गया। यह रैली सुबह 9ः00 बजे जिला न्यायालय परिसर के मुख्य द्वार से रवाना होकर दिल्ली गेट से बापू बाजार, सूरज पोल, अस्थल मंदिर, मुखर्जी चौक, घंटाघर, हाथीपोल, चेतक सर्कल होते हुए पुनः जिला न्यायालय परिसर मुख्य द्वार पर चल रहे धरना स्थल पहुंची।
चपलोत करेंगे 16 से आमरण अनशन
यह भी निर्णय लिया गया है कि 16 मई तक सरकार ने यदि उदयपुर में राजस्थान उच्च न्यायालय की खण्डपीठ स्थापित करने की दिशा में कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया तो राजस्थान विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष एवं संघर्ष समिति के संयोजक शान्तिलाल चपलोत अपना आमरण अनशन शुरू करेंगें, इसके बाद जो भी स्थितियां बनेगी उसके लिये राज्य सरकार जिम्मेदार होगी।
उल्लेखनीय है की उदयपुर में राजस्थान उच्च न्यायालय की खंडपीठ की स्थापना के लिए विगत 36 वर्षों से मेवाड़ वागड़ क्षेत्र के अधिवक्ता एवं क्षेत्र की जनता सतत् और लगातार आंदोलनरत है। इस आंदोलन को क्षेत्र में सभी जनप्रतिनिधियों, स्वयंसेवी, जनसेवी, धार्मिक, सामाजिक, व्यापारिक और श्रमिक संगठनों सहित आम जनता का भरपूर समर्थन मिला है, लेकिन सत्ता में आने के बाद राजनेताओं ने इस मांग को पूरा करने में अपना कोई विशेष कौशल नहीं दिखा पाए हैं, यही कारण है कि सत्ता में रहने वाले मेवाड़ के नेताओं मंत्रियों, सांसदों और विधायकों ने इस मुद्दे पर जनता के साथ वादाखिलाफी की है।
मेवाड़-वागड़ हाई कोर्ट बेंच संघर्ष समिति के आह्वान पर इस वर्ष चुनाव होने से पूर्व ‘‘करो या मरो’’ का लक्ष्य लेकर विगत 16 अप्रैल से जिला न्यायालय परिसर उदयपुर के सात संभाग के सभी जिला मुख्यालयों व तहसील स्तर पर क्रमिक अनशन शुरु किए गए हैं, जिसके अगले क्रम में आने वाले दिनों में कुछ उग्र कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिससे सरकार को इस मुद्दे पर अपनी सकारात्मक नीति बनाने के लिये मजबूर किया जा सके। इस मुद्दे को लेकर इंदिरा गांधी से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सभी को और हरिदेव जोशी से लेकर वसुंधरा राजे सिंधिया तक सभी मुख्यमंत्रियों को बार एसोसिएशन की तरफ से आदिवासी बहुल इलाके उदयपुर संभाग में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना किए जाने को लेकर लगातार ज्ञापन प्रेषित किए गए हैं, लेकिन किसी भी दल, राजनीतिक संगठन के नेताओं, मंत्रियों एवं मुख्यमंत्री ने इस मांग के प्रति अपनी कोई जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए राजधर्म का पालन नहीं किया, जिसकी वजह से न्याय का विकेंद्रीकरण करने वाली सरकारे आदिवासी बहुल क्षेत्र उदयपुर को और उदयपुर की जनता को सस्ता, सुलभ शीघ्र न्याय दिलाने के मामले में पूर्णतया विफल रही है ।
अब इस मांग को लेकर मेवाड़ की जनता चुप नहीं रहेगी समूचे मेवाड़ में इस मांग को लेकर आंदोलन धीरे-धीरे उग्र हो रहा है। देश में विभिन्न राज्यों में छोटे-छोटे इलाकों में राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते मुख्यमंत्री ने कहीं एक तो कहीं दो हाई कोर्ट बेंच स्थापित की है, लेकिन मेवाड़ में 36 साल के आंदोलन पर सरकार के माथे जूं नहीं रेंगी है। इस वर्ष चुनावी वर्ष होने से पूर्व संघर्ष समिति ने सरकार को वह दोनों राजनीतिक दलों को इस तरह से घेरने का कार्यक्रम बनाया है ताकि सरकार जनता की इस बहुप्रतिक्षित मांग को शीघ्र पूरा करें। संघर्ष समिति का नारा होगा हाईकोर्ट नहीं तो वोट नहीं जनता पूरी तरह जागरुक हो चुकी है।
आदिवासी बहुल क्षेत्र उदयपुर संविधान के विशेष अनुसूची 5 से गर्वन होता है और ऐसे में सरकार को तत्काल प्रभाव से उदयपुर आदिवासी क्षेत्र में राजस्थान उच्च न्यायालय की खंडपीठ की अनुशंसा राज्यपाल महोदय के माध्यम से राष्ट्रपति भिजवानी चाहिये। पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में जनजाति सलाहकार समिति की अहम भूमिका है और उस समिति की मुख्यमन्त्री अध्यक्ष है जिसे तत्काल उदयपुर में उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ स्थापित करने का प्रस्ताव राष्ट्रपति को भिजवाना चाहिये।
यहा यह उल्लेख करना उचित समझते है कि केन्द्र सरकार ने 2012 में दी नार्थ ईस्ट एरिया (उत्तर पूर्वी एरिया) के पूर्व गठन एवं अन्य सम्बधित कानून संशोधन एक्ट के द्वारा एक साथ 3 उत्तरपूर्वी राज्यों त्रिपूरा, मणिपुर एवं मेघालय में अलग-अलग उच्च न्यायालय स्थापित किये थे । पांचवी अनूसूचि के प्रावधानों के अनुसार गर्वनर अनुसूचित क्षेत्र में कोई भी नया कानून लागू कर सकता है और पूराने कानून को लागू होने से रोक सकता है। इन प्रावधानों का इस इलाके की गरीब जनता के लाभ के लिये उपयोग के बार आश्वासन के बावजूद निहित स्वार्थी तत्वों के प्रभाव के कारण यहां खंडपीठ स्थापित नहीं कर रही है।
यह मांग केवल अधिवक्ताओं की नहीं है बल्कि आदिवासियों के अलावा उदयपुर संभाग के प्रत्येक वर्ग की मांग है और प्रत्येक वर्ग कहीं ना कहीं न्याय से वंचित हो रहा है।
