सोलर पैनल में नेट मीटर लगाने से क्या होता है ? जाने बिजली बिल पर क्या पड़ेगा असर
Udaipur Times, Solar Panel Net Meter: देश में सोलर एनर्जी को बढ़ावा मिलने के साथ घरों की छत पर सोलर पैनल लगाने का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है। कई लोग बिजली का बिल कम करने के लिए ऑन-ग्रिड सोलर सिस्टम लगवा रहे हैं। हालांकि सोलर पैनल लगवाने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह रहता है कि दिन में बनने वाली अतिरिक्त बिजली का क्या होगा और रात में घर की बिजली की जरूरत कैसे पूरी होगी। ऐसे में नेट मीटर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
नेट मीटर आपके घर में बनने वाली सौर बिजली और बिजली ग्रिड से इस्तेमाल की जाने वाली बिजली का हिसाब रखने का काम करता है। आसान भाषा में समझें तो यह मीटर बताता है कि आपने बिजली विभाग के ग्रिड से कितनी यूनिट बिजली ली और आपके सोलर सिस्टम ने कितनी यूनिट बिजली ग्रिड को वापस दी। इसी रिकॉर्ड के आधार पर कई मामलों में बिजली बिल में समायोजन किया जाता है।
क्या होता है नेट मीटर और कैसे करता है काम?
नेट मीटर एक तरह का बाय-डायरेक्शनल यानी दोतरफा डिजिटल मीटर होता है। सामान्य बिजली मीटर मुख्य रूप से घर में ग्रिड से आने वाली बिजली की खपत रिकॉर्ड करता है, जबकि नेट मीटर बिजली के दोनों दिशाओं में होने वाले प्रवाह को माप सकता है। जब आपका सोलर पैनल घर की जरूरत से ज्यादा बिजली पैदा करता है, तो अतिरिक्त बिजली ग्रिड में चली जाती है। नेट मीटर इस बिजली को एक्सपोर्ट यूनिट के तौर पर रिकॉर्ड करता है। वहीं जब सोलर सिस्टम से पर्याप्त बिजली नहीं बनती और घर को ग्रिड से बिजली लेनी पड़ती है, तो मीटर उस बिजली को इंपोर्ट यूनिट के रूप में दर्ज करता है।
यही वजह है कि ऑन-ग्रिड सोलर सिस्टम में नेट मीटर को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि मीटरिंग और बिलिंग की व्यवस्था राज्य और संबंधित बिजली वितरण कंपनी के नियमों के अनुसार अलग हो सकती है।
दिन में ज्यादा बिजली बनने पर ग्रिड में जाती है बिजली
सोलर पैनल दिन के समय सूर्य की रोशनी से बिजली बनाते हैं। तेज धूप के दौरान कई बार पैनल घर की तत्काल जरूरत से ज्यादा बिजली पैदा कर सकते हैं। उदाहरण के लिए अगर आपके घर में उस समय 2 यूनिट बिजली की जरूरत है, लेकिन सोलर सिस्टम 4 यूनिट बिजली बना रहा है, तो बची हुई बिजली को ग्रिड से जुड़े सिस्टम में वापस भेजा जा सकता है।इस प्रक्रिया को एक्सपोर्ट ऑफ इलेक्ट्रिसिटी कहा जाता है। नेट मीटर ग्रिड में भेजी गई बिजली की मात्रा रिकॉर्ड करता रहता है। इस तरह घर में पैदा हुई अतिरिक्त बिजली का भी हिसाब बिजली वितरण कंपनी के रिकॉर्ड में दर्ज हो जाता है।
रात में कहां से मिलती है बिजली?
सोलर पैनल की सबसे बड़ी सीमा यह है कि यह सूर्य की रोशनी पर निर्भर करता है। रात के समय सोलर पैनल बिजली का उत्पादन नहीं करते। इसी तरह घने बादलों या कम धूप के दौरान भी उत्पादन घट सकता है।ऐसे समय में ऑन-ग्रिड सोलर सिस्टम वाला घर जरूरत के मुताबिक बिजली ग्रिड से ले सकता है। उदाहरण के लिए रात में पंखा, फ्रिज, टीवी, कूलर या दूसरी इलेक्ट्रिक चीजें चलाने के लिए ग्रिड से बिजली आती है।
नेट मीटर इस बिजली को भी रिकॉर्ड करता है।यानी ऑन-ग्रिड सिस्टम में बिजली का प्रवाह दोनों दिशाओं में हो सकता है। दिन में अतिरिक्त बिजली ग्रिड को दी जा सकती है और जरूरत पड़ने पर ग्रिड से बिजली ली जा सकती है। इसी वजह से ग्रिड को एक तरह के वर्चुअल बैकअप सिस्टम की तरह समझा जाता है, हालांकि यह वास्तविक बैटरी स्टोरेज नहीं होता।
बिजली बिल की गणना कैसे होती है?
महीने के अंत में बिजली वितरण कंपनी नेट मीटर से दर्ज डेटा के आधार पर बिल तैयार करती है। सामान्य तौर पर इसमें ग्रिड से ली गई बिजली यानी इंपोर्ट यूनिट और ग्रिड को भेजी गई बिजली यानी एक्सपोर्ट यूनिट का हिसाब देखा जाता है। उदाहरण के लिए अगर किसी महीने आपने ग्रिड से 300 यूनिट बिजली ली और आपके सोलर सिस्टम ने 250 यूनिट बिजली ग्रिड में भेजी, तो नेट आधार पर 50 यूनिट का अंतर बच सकता है।
ऐसे में लागू नियमों और टैरिफ व्यवस्था के अनुसार बिलिंग की जा सकती है।हालांकि यह जरूरी नहीं कि हर राज्य या डिस्कॉम में यही फॉर्मूला बिल्कुल इसी तरह लागू हो। कुछ जगह नेट मीटरिंग, ग्रॉस मीटरिंग या अन्य सेटलमेंट व्यवस्था लागू हो सकती है। इसलिए सोलर सिस्टम लगवाने से पहले स्थानीय बिजली वितरण कंपनी के नियम जरूर जांचने चाहिए।
क्या ज्यादा बिजली बनाने पर बिल बिल्कुल शून्य हो जाता है?
यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जाता है। अगर सोलर सिस्टम पर्याप्त बिजली पैदा करता है तो बिजली बिल में बड़ी कमी जरूर आ सकती है, लेकिन हर मामले में बिल पूरी तरह शून्य हो जाए, ऐसा जरूरी नहीं है।बिजली बिल में फिक्स्ड चार्ज, मीटर शुल्क, टैक्स या अन्य निर्धारित शुल्क शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा नेट मीटरिंग के नियम भी राज्य और बिजली वितरण कंपनी के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए सोलर पैनल लगवाने से पहले केवल यूनिट बचत ही नहीं, बल्कि पूरे बिलिंग स्ट्रक्चर को समझना जरूरी है।
नेट मीटर किस सोलर सिस्टम में जरूरी होता है?
नेट मीटर मुख्य रूप से ग्रिड-कनेक्टेड यानी ऑन-ग्रिड सोलर सिस्टम में इस्तेमाल होता है। इस सिस्टम में सोलर इन्वर्टर घर की बिजली व्यवस्था और बिजली ग्रिड के साथ जुड़ा रहता है।वहीं ऑफ-ग्रिड सोलर सिस्टम आमतौर पर ग्रिड से स्वतंत्र तरीके से काम करता है और उसमें बैटरी स्टोरेज की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे सिस्टम में नेट मीटरिंग की जरूरत उसी तरह नहीं होती जैसी ऑन-ग्रिड सिस्टम में होती है।
नेट मीटर लगाने से पहले किन बातों का ध्यान रखें?
अगर आप घर पर ऑन-ग्रिड सोलर पैनल लगवाने की योजना बना रहे हैं तो सबसे पहले अपने क्षेत्र की बिजली वितरण कंपनी के नियमों की जानकारी लें। नेट मीटर के लिए आवेदन प्रक्रिया, स्वीकृत सोलर क्षमता, तकनीकी जांच और मीटर बदलने की प्रक्रिया अलग-अलग हो सकती है।इसके अलावा सोलर सिस्टम की क्षमता तय करते समय घर की औसत मासिक बिजली खपत, छत पर उपलब्ध जगह, धूप की स्थिति और भविष्य की बिजली जरूरत को ध्यान में रखना चाहिए। केवल ज्यादा क्षमता का सिस्टम लगवा लेना हमेशा सबसे अच्छा विकल्प नहीं होता।
सोलर पैनल के साथ नेट मीटर क्यों है जरूरी?
कुल मिलाकर कहा जाए तो नेट मीटर ऑन-ग्रिड सोलर सिस्टम में बिजली के आने और जाने का हिसाब रखने वाला महत्वपूर्ण उपकरण है। दिन में सोलर पैनल से जरूरत से ज्यादा बिजली बनने पर उसे ग्रिड में भेजा जा सकता है, जबकि रात या कम उत्पादन के समय घर ग्रिड से बिजली ले सकता है।इसी दोतरफा बिजली प्रवाह का रिकॉर्ड नेट मीटर रखता है और संबंधित नियमों के तहत इसी डेटा के आधार पर बिजली बिल का हिसाब किया जाता है। हालांकि नेट मीटरिंग के नियम, यूनिट सेटलमेंट और बिलिंग व्यवस्था राज्य तथा संबंधित डिस्कॉम के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए सोलर सिस्टम लगवाने से पहले स्थानीय नियमों की जानकारी लेना सबसे जरूरी है।