7 रेल रूटों को किया जाएगा फोरलेन ? सरकार ने दी मंजूरी, देखें पूरा रूटप्लान
Udaipur Times, Indian Railways : भारतीय रेलवे के सबसे व्यस्त रेल रूट्स पर ट्रेनों की बढ़ती संख्या और लगातार बढ़ रहे यातायात के दबाव को देखते हुए केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। रेलवे नेटवर्क की क्षमता बढ़ाने के लिए देश के 7 हाई डेंसिटी नेटवर्क (HDN) कॉरिडोर को मल्टी-ट्रैकिंग के जरिए मजबूत किया जाएगा।
केंद्रीय कैबिनेट ने इन महत्वपूर्ण रेलवे परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है। इन प्रोजेक्ट्स के पूरा होने के बाद व्यस्त रेल मार्गों पर ट्रेनों की आवाजाही के लिए अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध होगी और यात्री व मालगाड़ियों के संचालन को बेहतर तरीके से मैनेज करने में मदद मिल सकती है।
दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-हावड़ा जैसे व्यस्त रूट होंगे मजबूत
रेलवे के जिन प्रमुख रूट्स पर क्षमता बढ़ाने की योजना है, उनमें दिल्ली-मुंबई, दिल्ली-हावड़ा और मुंबई-चेन्नई जैसे देश के महत्वपूर्ण रेल कॉरिडोर शामिल हैं। इन रूट्स पर यात्री ट्रेनों के साथ बड़ी संख्या में मालगाड़ियां भी चलती हैं। ट्रेनों की संख्या बढ़ने के साथ मौजूदा ट्रैक पर परिचालन का दबाव भी लगातार बढ़ा है।मल्टी-ट्रैकिंग और अतिरिक्त रेल लाइनों के निर्माण से एक ही रूट पर ट्रेनों के संचालन के लिए ज्यादा ट्रैक उपलब्ध हो सकेंगे। इससे ट्रेनों को क्रॉसिंग या दूसरे ट्रैफिक की वजह से रोकने की जरूरत कम करने में मदद मिल सकती है और रेलवे की परिचालन क्षमता में सुधार की उम्मीद है।
सात हाई डेंसिटी कॉरिडोर पर बढ़ेगी क्षमता
हाई डेंसिटी नेटवर्क यानी HDN कॉरिडोर भारतीय रेलवे के सबसे ज्यादा व्यस्त रेल मार्गों में शामिल होते हैं। इन रूट्स पर यात्री और माल यातायात दोनों का दबाव काफी अधिक रहता है। ऐसे में इन कॉरिडोर पर अतिरिक्त लाइनें विकसित करना रेलवे की क्षमता बढ़ाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।नई रेल लाइनों के तैयार होने के बाद मौजूदा रूट पर ट्रेनों की संख्या बढ़ाने की गुंजाइश बनेगी। साथ ही भविष्य में नई यात्री सेवाएं शुरू करने और माल परिवहन को अधिक क्षमता देने में भी रेलवे को मदद मिल सकती है।
दक्षिण भारत में भी 540 किलोमीटर के प्रोजेक्ट
रेलवे क्षमता विस्तार की योजना केवल उत्तर और पश्चिम भारत तक सीमित नहीं है। कैबिनेट ने तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में 5 मल्टी-ट्रैकिंग प्रोजेक्ट्स को भी मंजूरी दी है। इन परियोजनाओं की कुल लंबाई करीब 540 किलोमीटर होगी और इन पर लगभग 10,021 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।इन परियोजनाओं को वर्ष 2029-30 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। दक्षिण भारत में रेल नेटवर्क के इन विस्तार कार्यों से प्रमुख औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों के बीच रेल कनेक्टिविटी मजबूत होने की उम्मीद है।
अरक्कोनम-रेणिगुंटा से लेकर काजीपेट तक बढ़ेंगी लाइनें
मंजूर किए गए प्रोजेक्ट्स में अरक्कोनम-रेणिगुंटा तीसरी और चौथी लाइन भी शामिल है, जिसकी लंबाई करीब 77 किलोमीटर होगी। इसके अलावा व्हाइटफील्ड-बंगारपेट तीसरी और चौथी लाइन का करीब 47 किलोमीटर का प्रोजेक्ट भी प्रस्तावित है।
इसी तरह होसुर-ओमलूर डबलिंग परियोजना करीब 147 किलोमीटर लंबी होगी, जबकि सेलम-करूर-दिंडीगुल डबलिंग की लंबाई लगभग 159 किलोमीटर बताई गई है। इसके अलावा सिकंदराबाद यानी घाटकेसर-काजीपेट मल्टी-ट्रैकिंग परियोजना करीब 110 किलोमीटर लंबी होगी।इन सभी प्रोजेक्ट्स का उद्देश्य व्यस्त रेल मार्गों पर अतिरिक्त ट्रैक उपलब्ध कराकर ट्रेन संचालन की क्षमता बढ़ाना है।
2,121 गांवों को मिलेगा बेहतर रेल कनेक्शन
सरकार के मुताबिक, इन रेलवे क्षमता विस्तार परियोजनाओं का सीधा या अप्रत्यक्ष लाभ करीब 2,121 गांवों तक पहुंच सकता है। इन गांवों की कुल आबादी लगभग 52 लाख बताई गई है।नई रेल लाइनें बनने से इन क्षेत्रों में ट्रेनों की आवाजाही के लिए अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध होगी। इससे यात्रियों को बेहतर रेल सेवा मिलने के साथ आसपास के इलाकों से बड़े शहरों तक आने-जाने के विकल्प भी बढ़ सकते हैं। रेल कनेक्टिविटी बेहतर होने से स्थानीय व्यापार और रोजगार से जुड़ी गतिविधियों को भी फायदा मिलने की संभावना है।
माल ढुलाई की क्षमता में भी होगा बड़ा इजाफा
इन परियोजनाओं का फायदा केवल यात्रियों तक सीमित नहीं रहेगा। अतिरिक्त रेल ट्रैक बनने से मालगाड़ियों के संचालन के लिए भी ज्यादा क्षमता उपलब्ध होगी। रेलवे के अनुसार इन परियोजनाओं से करीब 47 मिलियन टन प्रति वर्ष यानी 47 MTPA अतिरिक्त माल ढुलाई क्षमता पैदा हो सकती है।इससे कोयला, खनिज, औद्योगिक सामान और अन्य जरूरी वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है। रेल के जरिए माल परिवहन बढ़ने से सड़क नेटवर्क पर भारी वाहनों का दबाव कम करने में भी सहायता मिल सकती है।
पर्यटन और क्षेत्रीय विकास को भी मिलेगा इसका फायदा
बेहतर रेल कनेक्टिविटी का असर पर्यटन पर भी पड़ सकता है। प्रमुख पर्यटन स्थलों और शहरों तक ट्रेनों की संख्या और संचालन क्षमता बढ़ने से यात्रियों के लिए यात्रा के विकल्प बेहतर हो सकते हैं।इसके अलावा जिन इलाकों में औद्योगिक गतिविधियां बढ़ रही हैं, वहां बेहतर रेल नेटवर्क कच्चे माल और तैयार उत्पादों की आवाजाही को आसान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इससे क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
2029-30 तक प्रयोजन को पूरा करने का लक्ष्य
दक्षिण भारत की इन 5 मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं को 2029-30 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि इतने बड़े रेलवे प्रोजेक्ट्स को पूरा करने की समयसीमा भूमि, निर्माण कार्य, तकनीकी मंजूरियों और स्थानीय परिस्थितियों समेत कई कारकों पर निर्भर करती है।परियोजनाओं के चरणबद्ध तरीके से पूरा होने के साथ अलग-अलग रेल सेक्शन पर क्षमता बढ़ती जाएगी। इससे व्यस्त रूट्स पर ट्रेनों के संचालन को ज्यादा व्यवस्थित करने में मदद मिल सकती है।
आख़िर रेलवे के लिए क्यों अहम है मल्टी-ट्रैकिंग रुट?
भारतीय रेलवे में कई प्रमुख रूट ऐसे हैं जहां पहले से ही ट्रेनों की संख्या काफी ज्यादा है। ऐसे रूट पर नई ट्रेन चलाने के लिए सिर्फ कोच या इंजन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि ट्रैक क्षमता बढ़ाना भी जरूरी होता है। मल्टी-ट्रैकिंग इसी जरूरत को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। स्प्ष्ट रूप से कहें तो, दिल्ली-मुंबई, दिल्ली-हावड़ा और मुंबई-चेन्नई जैसे व्यस्त रेल कॉरिडोर समेत देश के कई महत्वपूर्ण मार्गों पर क्षमता बढ़ाने की योजना भारतीय रेलवे के लिए अहम मानी जा रही है।
दक्षिण भारत में करीब 540 किलोमीटर की अतिरिक्त रेल परियोजनाओं पर 10,021 करोड़ रुपये के अनुमानित निवेश से यात्रियों के साथ माल ढुलाई को भी फायदा मिलने की उम्मीद है। परियोजनाओं के पूरा होने के बाद रेलवे नेटवर्क में अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध होगी, जिससे भविष्य में ट्रेनों की संख्या और संचालन को बढ़ाने में मदद मिल सकती है।