आपकी ड्रेस ही आपका एड्रेस होता है: डॉ. मुनि प्रणामसागर जी

जीवन में मनुष्य को हमेशा अपना पहचान चिन्ह साथ में रखना चाहिये ताकि सामने वाला समझ जाए कि यह व्यक्ति कौन है और इसका कर्म क्या है। कई बार आपकी ड्रेस ही आपका एड्रेस बता देती है। ड्रेस भी आपके कर्मों के आधार पर ही आपको पहननी चाहिये ताकि सामने वाले को आपको एड्रेस करने में आसानी हो सके। उक्त विचार डॉ. मुनि प्रणाम सागरजी महाराज ने नगर निगम प्रांगण में हो रहे सिद्धचक्र महामण्डल विधान में उपस्थित श्रावकों के मध्य व्यक्त किये।

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आपकी ड्रेस ही आपका एड्रेस होता है: डॉ. मुनि प्रणामसागर जी

जीवन में मनुष्य को हमेशा अपना पहचान चिन्ह साथ में रखना चाहिये ताकि सामने वाला समझ जाए कि यह व्यक्ति कौन है और इसका कर्म क्या है। कई बार आपकी ड्रेस ही आपका एड्रेस बता देती है। ड्रेस भी आपके कर्मों के आधार पर ही आपको पहननी चाहिये ताकि सामने वाले को आपको एड्रेस करने में आसानी हो सके। उक्त विचार डॉ. मुनि प्रणाम सागरजी महाराज ने नगर निगम प्रांगण में हो रहे सिद्धचक्र महामण्डल विधान में उपस्थित श्रावकों के मध्य व्यक्त किये।

मुनिश्री ने कहा कि जिस तरह खाकी कपड़े पहने व्यक्ति को पुलिस के नाम से पहचाना जाता है, सफेद कपड़े पहनने वाले व्यक्ति को डॉक्टर के नाम से जाना जाता है, काला कोट पहनने वाले व्यक्ति को वकील के नाम से जाना जाता है। उन्हें देखते ही सामने वाला समझ जाता है कि ये कौन है और इनका क्या कर्म है और ये हमारे किस तरह से काम आ सकते हैं। उसी तरह से साधुओं की ड्रेस भी उनका एड्रेस बता देती है,लेकिन दुनिया में दिगम्बर साधु ही ऐसे होते हैं जिनका बिना ड्रेस ही लोगों को उनका एड्रेस पता चल जाता है कि यह सिर्फ और सिर्फ दिगम्बर जैन साधु है। कपड़ों का त्याग तो सिर्फ एक दिगम्बर साधु करता है जबकि उसके पीछे- पीछे चलने वाला पूरा समाज अपने आप ही दिगम्बर बन जाता है।

अध्यक्ष अशोक शाह ने बताया कि विधान के प्रारम्भ में प्रात: श्रीजी का अभिषेक एवं शांतिधारा हुई। पूरा प्रांगण श्रावक-श्राविकाओं से खचाखच भरा हुआ था। विधान एवं मुनिश्री के प्रवचन का लाभ लेने के लिए पूरेे शहर के समाज के श्रावक-श्राविकाएं पांडाल में पहुंच कर धर्म लाभ ले रहे हैं।

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