Rajasthan: मौसम बदल रहा है और खेती का भरोसा भी
UdaipurTimes, October 6, 2026 | Rajasthan Farmers and Rural Issues: लगातार बदलते पर्यावरण ने खेती किसानी को मुश्किल में डाल दिया है. अब किसान के लिए सबसे बड़ी चिंता केवल पानी, बीज, खाद या बाजार नहीं रह गई है। मौसम का बदलता मिजाज भी खेती के फैसलों को अनिश्चित बना रहा है। कभी जरूरत के समय बारिश नहीं होती, कभी बेमौसम बारिश खड़ी या कटी फसल को नुकसान पहुंचा देती है, तो कभी तापमान इतना बढ़ जाता है कि फसल की पैदावार ही प्रभावित हो जाती है। सर्दियों में अत्यधिक ठंड और पाला भी फसल के लिए खतरा बन जाता है।
राजस्थान जैसे राज्य में, जहां बड़ी संख्या में खेती वर्षा और सीमित सिंचाई संसाधनों पर निर्भर है, मौसम में होने वाला यह बदलाव छोटे किसानों के लिए और ज्यादा गंभीर है। यहां खरीफ, रबी और जायद रबी तीन प्रमुख कृषि मौसम हैं। राज्य के आधिकारिक कृषि आंकड़ों के अनुसार खरीफ में बाजरा, ज्वार, मक्का, कपास, तिल, अरंडी, सोयाबीन और मूंगफली जैसी फसलें होती हैं, जबकि रबी में गेहूं, जौ, चना, सरसों, तारामीरा और अलसी प्रमुख हैं। जायद रबी में मूंग, ज्वार, बाजरा, सब्जियों और चारे जैसी फसलें ली जाती हैं।
2024-25 में राजस्थान में करीब 38.20 लाख हेक्टेयर में बाजरा, 37.83 लाख हेक्टेयर में गेहूं, 30.51 लाख हेक्टेयर में सरसों और 15.53 लाख हेक्टेयर में चने की खेती का अनुमान लगाया गया था। यह बताता है कि राज्य की खेती कुछ प्रमुख फसलों और उनके अनुकूल मौसम पर कितनी निर्भर है। लेकिन पिछले तीन कृषि वर्षों के आंकड़े भी खेती की इस अनिश्चितता की तस्वीर दिखाते हैं। राजस्थान सरकार के आर्थिक समीक्षा दस्तावेज के अनुसार राज्य का कुल खाद्यान्न उत्पादन 2022-23 में 252.80 लाख मीट्रिक टन था, जो 2023-24 में घटकर 241.86 लाख मीट्रिक टन रह गया। 2024-25 में यह 267.67 लाख मीट्रिक टन रहने का अग्रिम अनुमान था। यानी उत्पादन में एक साल गिरावट और अगले साल सुधार दिखाई देता है।
लेकिन कुल उत्पादन बढ़ने का अर्थ यह नहीं कि हर किसान की आमदनी भी उसी अनुपात में बढ़ी है। एक किसान की फसल अच्छी हो सकती है, जबकि दूसरे किसान की फसल बारिश, सूखे, बीमारी या तापमान के कारण खराब हो सकती है। जलवायु की अनिश्चितता को राजस्थान की बारिश के आंकड़ों से भी समझा जा सकता है। राज्य सरकार के अनुसार जून से सितंबर 2024 के दौरान राजस्थान में वास्तविक वर्षा 662.44 मिलीमीटर हुई, जबकि सामान्य वर्षा 417.46 मिलीमीटर थी, यानी सामान्य से 58.68 प्रतिशत अधिक। अधिक बारिश सुनने में अच्छी खबर लग सकती है, लेकिन खेती के लिए बारिश का सही समय और सही मात्रा में होना अधिक महत्वपूर्ण है। कम दिनों में बहुत अधिक बारिश खेत में पानी भरने, मिट्टी बहने और तैयार फसल को नुकसान पहुंचाने का कारण बन सकती है। दूसरी तरफ बारिश की लंबी कमी किसान को सिंचाई के लिए भूजल और महंगे डीजल पर निर्भर कर सकती है।
छोटे किसानों के लिए यह जोखिम और बड़ा है। वह जमीन के छोटे से टुकड़े पर खेती करता है। पहले जुताई के लिए खर्च करता है, फिर बीज का इंतजाम करता है, महंगे उर्वरक और कीटनाशक खरीदता है। सिंचाई की जरूरत पड़ने पर पंपिंग सेट और डीजल का खर्च उठाता है। कई बार इसके लिए कर्ज लेना पड़ता है। किसान के पास इतना बड़ा खेत या आर्थिक संसाधन नहीं होता कि एक फसल खराब होने पर दूसरी जगह से नुकसान की भरपाई कर सके। इसलिए जब मौसम फसल को नुकसान पहुंचाता है, तो सिर्फ एक मौसम की मेहनत नहीं जाती, बल्कि अगले मौसम की खेती भी मुश्किल हो सकती है। कर्ज की एक किस्त दूसरी किस्त का रास्ता खोलती है और किसान धीरे-धीरे आर्थिक दबाव में फंसता जाता है।
इस नुकसान का असर खेत तक सीमित नहीं रहता। खेती में महिलाओं का श्रम अक्सर दिखाई नहीं देता, लेकिन वह फसल की पूरी प्रक्रिया में मौजूद रहता है। घर का काम संभालने के बाद महिलाएं खेत में निराई-गुड़ाई करती हैं, पौधों की देखभाल करती हैं, कीड़े और बीमारी पर नजर रखती हैं और कई बार कटाई के काम में भी हाथ बंटाती हैं। उनके लिए फसल केवल अनाज या बाजार में बिकने वाली उपज नहीं होती। उसी से बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च, इलाज और भविष्य की योजनाएं जुड़ी होती हैं। फसल खराब होने पर आर्थिक चिंता के साथ घर की महिलाओं पर घरेलू जिम्मेदारियों और तनाव का अतिरिक्त बोझ भी आता है। जिन परिवारों में जमीन बहुत कम है, वहां यह दबाव और गहरा हो जाता है।
हालांकि किसानों को जोखिमों से बचाने के लिए सरकारों ने कई योजनाएं चलाई हैं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों में से एक है। इसमें किसान के लिए खरीफ फसलों पर अधिकतम 2 प्रतिशत, रबी फसलों पर 1.5 प्रतिशत और वाणिज्यिक एवं बागवानी फसलों पर 5 प्रतिशत तक प्रीमियम का प्रावधान है। सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि, तूफान, कीट-रोग और कुछ परिस्थितियों में बेमौसम बारिश से होने वाले नुकसान को योजना के तहत कवर किया जाता है। राजस्थान के आर्थिक समीक्षा के अनुसार 15 दिसंबर 2023 से 31 दिसंबर 2025 के बीच पात्र किसानों को फसल बीमा के तहत लगभग 6,206.61 करोड़ रुपये के दावे वितरित किए गए।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत पात्र भूमिधारी किसान परिवारों को सालाना 6,000 रुपये तीन बराबर किस्तों में सीधे बैंक खाते में दिए जाते हैं। यह रकम बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन बीज, खाद या अन्य छोटे कृषि खर्चों के समय किसान को तत्काल सहारा दे सकती है। राजस्थान में भी ब्याज मुक्त अल्पकालीन कृषि ऋण जैसी व्यवस्था है। राज्य की आर्थिक समीक्षा के अनुसार 2024-25 में दिसंबर 2024 तक सहकारी बैंकों के माध्यम से 30.12 लाख किसानों को 16,781.27 करोड़ रुपये के फसल ऋण वितरित किए गए थे।
लेकिन योजनाओं की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह है कि सबसे छोटे किसान तक इसका लाभ कितनी आसानी से पहुंचता है? किसान को यह पता होना चाहिए कि उसकी फसल किस योजना में शामिल है, बीमा कब कराना है, नुकसान होने पर सूचना कब देनी है, मुआवजे की प्रक्रिया क्या है और बाजार में कहां बेहतर कीमत मिल सकती है। मौसम को बदला नहीं जा सकता, लेकिन किसान को ज़रूरत के समय अकेला छोड़ना भी नहीं है। खेती का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम किसान को केवल फसल उगाने वाला व्यक्ति मानते हैं या बदलते मौसम के बीच सुरक्षित खेती करने का अधिकार रखने वाला नागरिक भी।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)