"डॉक्टर साहब... मैं बच तो जाऊँगा न?" | असंभव से संभव की तरफ; एक नए जीवन की शुरुआत

 | 
KD cancer therapy centre hospital ahmedabad dr kush shah

UdaipurTimes, September 22, 2026 | Health and Medicine: "कैंसर उम्र देखकर नहीं आता, आज यह साबित हो गया..." आँखों में भरे आँसू और हाथ में थामे बायोप्सी रिपार्ट के साथ राजेश शर्मा (नाम बदला गया है) बड़ी मुश्किल से बोल पाए। सामने बैठे पिता के पैरों तले मानो ज़मीन खिसक गई। कैंसर, यह एक शब्द कान में पड़ते ही पूरे घर में सन्नाटा छा गया। सिर्फ 37 साल की उम्र में? कैसे? तीन साल की बेटी का क्या होगा?

राजेश के मन में विचारों का बवंडर चल रहा था। पर वे जानते थे कि अगर वे खुद टूट गए, तो पूरा परिवार हिम्मत हार जाएगा। पास बैठे छोटे भाई ने उनका हाथ थामकर धीरे से कहा, "चिंता मत कर, सब ठीक हो जाएगा।" लेकिन उस पल दिल में चल रही उथल-पुथल के आगे ये शब्द बेहद फीके लग रहे थे। पिता ने गले में अटके दर्द को दबाते हुए हिम्मत जुटाई: "बेटा, हमें तुरंत ऑन्कोलॉजिस्ट को दिखाना होगा।"

अगले ही दिन वे के.डी कैंसर सेंटर में डॉ. कुश शाह से मिले।

"डॉक्टर साहब... मैं बच तो जाऊँगा न?" राजेश के मुँह से यह शब्द बेबसी में निकल गए।

डॉ. कुश ने उन्हें शांति से बैठाया और एक अनुभवी डॉक्टर की तरह ढांढस बंधाते हुए कहा, "अभी पक्के तौर पर कुछ कहना मुश्किल है, लेकिन हम पूरी ताकत से लड़ेंगे। आप हिम्मत रखेंगे तो नतीजा ज़रूर अच्छा आएगा।" डॉक्टर के इन शब्दों ने राजेश के मन में उम्मीद की एक किरण जगा दी। "डॉक्टर साहब, आप जो कहेंगे मैं वो करने को तैयार हूँ, बस मुझे ठीक कर दीजिए।"

पेट-सीटी (PET-CT) और जरूरी ब्लड टेस्ट कराने पर पता चला कि राजेश को 'गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल स्टोमल ट्यूमर' (GIST) यानी पेट का एक दुर्लभ कैंसर था। सीधे सर्जरी करना जोखिम भरा था और उसमें पेट का एक बहुत बड़ा हिस्सा निकालना पड़ता। राजेश की कम उम्र को ध्यान में रखते हुए डॉ. कुश ने सर्जरी के बजाय एक अलग और अधिक सुरक्षित रास्ता सुझाया।

उन्होंने पहले 'टारगेटेड ओरल थेरेपी' (दवाइयों द्वारा इलाज) शुरू करने का फैसला लिया, ताकि ट्यूमर छोटा हो जाए और उसके बाद ही सर्जरी की जाए।

एक नई उम्मीद के साथ राजेश ने इलाज शुरू किया। लगातार छह महीने की नियमित थेरेपी का शानदार असर देखने को मिला और ट्यूमर का आकार बहुत छोटा हो गया। जब दोबारा पेट-सीटी स्कैन कराया गया, तो रिपोर्ट में ट्यूमर लगभग खत्म होने की कगार पर आ चुका था, जिससे बड़ा खतरा टल गया।

अब रास्ता बिल्कुल आसान था। डॉ. कुश ने लेप्रोस्कोपिक (मिनिमली इनवेसिव) सर्जरी के जरिए बाकी बचे छोटे से हिस्से को निकालने की सलाह दी। सर्जरी पूरी तरह सफल रही।

आज सर्जरी को छह महीने बीत चुके हैं। राजेश पहले की तरह ही हंसते-खेलते अपनी सामान्य जिंदगी जी रहे हैं और परिवार के साथ बेहद खुश हैं।

सही समय पर सही फैसला लेने और परिवार के साथ ने राजेश को उनकी मुस्कान वापस लौटा दी। आज जब वे अपनी बेटी को गोद में खिलाते हैं, तो लगता है कि उस दिन हिम्मत न हारने का फैसला कितना सही था।

Disclaimer:This Post is not written or produced by UdaipurTimes writers/journalists. UdaipurTimes follows ASCI guidelines for Online Advertising. The information may involve financial or health risk and UdaipurTimes does not endorse or promote any claims made in this post.

Follow UdaipurTimes on Facebook , Instagram , and Google News