महाराणा प्रताप की विजय के समर्थन में 20 साल पहले सामने आए थे इतिहासकार डॉ. चंद्रशेखर शर्मा

इतिहासकार ने कॉपर प्लेट, राजस्व रिकॉर्ड और फारसी स्रोतों के आधार पर महाराणा प्रताप की जीत के पक्ष में पेश किए थे प्रमाण।

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Historian Dr Chandrashekhar Sharma reacting to RSS chief Mohan Bhagwat's remarks and presenting evidence supporting Maharana Pratap's victory in the Battle of Haldighati during Maharana Pratap Jayanti celebrations in Udaipur.

 

 

 

 

 

 

उदयपुर में बुधवार को महाराणा प्रताप की 486 वी जयंती मनाई गई जिसके दौरान कार्यक्रम में  बतौर मुख्य वक्ता RSS के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत मौजूद रहे।  कार्यक्रम में सभा को सम्भोधित करते हुए उन्होंने कहा की हल्दीघाटी युद्ध जिसको 450 साल पुरे हो चुके हैं उसको लेकर इतिहासकारों ने मनघडंत नरेटिव बनाया।  

मोहन भगवत के बयान पर देश में महाराणा प्रताप के जीवन पर प्रथम पीएचडी होल्डर और 20 साल पहले अपनी रिसर्च से हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप की विजय बतलाने वाले इतिहासकार डॉ चंद्रशेखर शर्मा ने अपनी प्रतिक्रिया दी। 

मीडिया से बात करते हुए शर्मा ने बताया की साल 2005-06 में उन्होंने प्रताप के जीवन पर पीएचडी की और 2006 में महाराणा पर आधारित पहली पुस्तक राष्ट्र रत्न महाराणा प्रताप प्रकाशित की। इसको इसको लेकर उस समय के तत्कालीन पूर्व उप-राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत ने उन्हें दिल्ली में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर पर बोलने के लिए बुलाया। जिसके बाद सभी नेशनल न्यूज़ पेपर्स में भी ये खबर प्रकाशित हुई थी। 

शर्मा ने कहा की इसके अतिरिक्त 2017 में राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड उन्होंने एक लेखक के रूप में अध्याय लिखे जिसमे हल्दीघाटी के विजय का अध्याय भी शामिल है। जिसको पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। साथ ही राजस्थान विश्वविद्यालय के एम् ए के ईस्टर पर उनके द्वारा लिखी गई इस किताब जिसमे महाराण प्रताप हल्दीघाटी युद्ध में विजेता के रूप में सारा रिसर्च वर्क है उसे छात्रों को पढ़ाया जा रहा है और उसे रेफ़्रेन्स बुक के रूप में रखी गई है। 

शर्मा ने हल्दीघाटी की विजय का प्रमाण देते हुए कहा की पिछले 21 सालों से बड़े स्तर पर उनके द्वारा इस मुद्दे पर कार्य किया गया है, और क्योंकी मोहन भागवत जी सामाजिक रूप से , सांस्कृतिक रूप से जुड़े है तो उनको जरूर इस बारे में जानकारी होगी की हल्दीघाटी पर महाराणा प्रताप पर इतना बड़ा कार्य पूर्व में हो चूका है। 

शर्मा ने कहा की इस काम के दौरान उन्होंने काफी इतिहासकारों का सामना किया अपनी इस मेहनत को प्रमाणित करने में। जब शर्मा से पूछा गया की इतने सालों तक इतिहास में कुछ और पढ़ाया गया, सही इतिहास क्या है ? तो उन्होंने कहा की मैंने जब अपनी रिसर्च इस टोपिक पर शुरू की थी तो मैंने कोई ऐसा सोचा नहीं था की मुझे प्रताप को विजेता घोषित करना ही है, लेकिन जब रिसर्च के दौरान मुझे कुछ कॉपर प्लेट्स मिली, ऐसी प्लेट्स जिन पर पहले कोई अध्ययन नहीं हुआ था ना ही किसी इतिहासकार ने पहले पहले कोई एविडेंस नहीं दिया था।  इस के बाद जब उन प्लेट्स का वेरिफिकेशन किया गया और साथ ही उनके ठिकाना रिकॉर्ड से मिलान किया गया तो मुझे लगा की हल्दी घाटी युद्ध के ठीक 4 महीने बाद, या फिर 8 महीने बाद ही प्रताप जमीन के पट्टे जारी कर रहे है और वहां की जनता भी उन पट्टों का इंतजार केर रही है। तब मेरा दिमाग एक तरफ डाइवर्ट हुआ की यहां कहानी कुछ और ही कह रही है। इसी के साथ ही जब चित्तौड़गढ़, मांडल अधिकार में आ गए तो वहां पर उन्होंने अपना फौजदार बिठाया, वहां पर अपने सिक्के चलाए और चित्तौड़गढ़ और मांडल के राजस्व को अजमेर के सूबे से जोड़ा। तो जहां-जहां भी मेवाड़ की जीत हुई है वहां सभी जगहों पर कोई न कोई प्रमाण पाए गए या सिम्टम्स देखने को मिलते है। लेकिन इस से पहले हल्दी घाटी में ऐसे कोई सिम्टम्स देखने को नहीं मिले थे। दूसरी तरफ जमीं के जो पट्टे हैं वो महाराण प्रताप जारी केर रहे हैं अकबर जारी नहीं कर रहे, क्युकी अगर अकबर का अधिकार होता या अकबर की जीत हुई होती तो अकबर पट्टे जारी कर रहे होते ये एक इतिहास का प्राइमरी सोर्स है जिसमे राजस्व रिकॉर्ड आता है जिसके आधार पर देखा जा सकता है की जीत किसकी हुई थी। 

इसके अलावा रिसर्च के दौरान ये भी पाया की मान सिंह जिसे मुग़लों द्वारा "फरजंद" यानी की बेटा की उपाधि मिली थी वो भी इस युद्ध के बाद मुगलों के सामने नहीं गए, उन्हें मुगलों द्वारा बुलाया गया था और अकबर के सामने जाने पर अकबर उनसे नाराज थे, अगर अकबर जीते होते तो उन्हें तो खुश होना चाहिए था न? और उन्हें 2 महीने तक सामने नहीं आने का आदेश भी दिया गया था। लेकिन अपने इतने चहेते व्यक्ति जिसे बेटे का लक़ब दिया गया हो उस से इतना नाराज होने का कारण क्या था ? ये था की अकबर को समझ में आ गया की वो हल्दीघाटी युद्ध हार गए है। 

शर्मा ने कहा की इस के साथ साथ मुग़ल सल्तनत का इतिहासकार अब्दुल क़ादिर बदांयूनी ने भी यहाँ से जाते समय लिखा था की जब मैं हल्दीघाटी से फतेहपुरा सीकरी तक गया तब किसी ने भी ये विश्वास नहीं किया की हम हल्दीघाटी युद्ध हार गए हैं।  उनसे ये भी लिखा की इस हल्दीघाटी युद्ध की एक मात्र उपलब्धि राम प्रसाद हाथी था। तो इन सभी दृश्यों से यहीं प्रमाणित होता है की हम हल्दीघाटी युद्ध जीते थे।  

इसके साथ ही रिसर्च वर्क में ये बात सामने आई की मान सिंह के हाथी पर पहला आक्रमण महाराणा प्रताप ने किया, मुग़ल सेना पर भी पहला आक्रमण प्रताप ने किया  जब की आक्रमण करने मुग़ल सेना आई है और मान सिंह मुक़ाबला करने के बजाए छुप रहे है। जब इस तरह के परिदृश्य मेने पर्शियन और लोकल सोर्सेस में पढ़े तब मुझे लगा की चाहे पहले ये बात कही गई हो की मुग़लों ने इस युद्ध को जीता था या ये भी कहा जाता रहा है की ये युद्ध अनिर्णीत था नहीं मानता। शर्मा ने कहा की मेरा मानना है की युद्ध के बाद जिस राजा का अधिकार होता है जिसकी बात को माना जाता है वही जीता है।  

शर्मा ने प्रमाण देते हुए कहा की उस समय की रणनिति भी देखी जाए तो पहले ये माना जाता था की अगर क़िला जीत लिया मतलब राज्य जीत लिया, अगर बात की जाए मध्य काल की तो सभी जगह जीत हासिल की प्रताप उस समय युवा थे और वे ये सभी नीतियां देख रहे थे, प्रताप ने गुरिल्ला युद्ध नीति जिसको छापामार युद्ध नीति भी कहा जाता है वो युद्ध प्रताप ने लड़ा। महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक का एक पैर घायल हो गया जिसको बचाने के लिए उन्होंने जगह बदली थी जिसका जिक्र पर्शियन इतिहास में बदायूंनी ने भी किया है की 6 कोस तक मुग़ल सेना उलटी भागती हुई गई है। इस स्थिति में प्रताप ने चेतक की रक्षा करने के लिए अपना स्थान परिवर्तन किया ना की पलायन किया जब की इतिहास में पलायन लिखा गया। इन सभी शब्दों को मैने ध्यान से पढ़ा और फिर लिखा है। ये माना जाता था की अकबर की सेना एक अपराजित सेना थी और मध्य काल के उस समय में अकबर की सेना को वर्ल्ड पावर मन जाता था, लेकिन जब हल्दीघाटी युद्ध की समीक्षा हुई तो वहां मुग़ल सेना द्वारा कहा गया होगा की हम हल्दी घाटी की वजह से युद्ध हारे क्यों की वो घाटी ही इसी तरह की थी। 

शर्मा ने बताया की उनकी रिसर्च में सामने आया की जून माह में ये युद्ध हुआ था और उसके कुछ समय बाद अकबर खुद हल्दी घाटी देखने के लिए आया की आखिर ऐसी कोनसी घाटी है जिसकी वजह से उसकी इतनी ताकतवर कहे जाने वाली सेना भी युद्ध हार गई, ये जिज्ञासा अकबर के दिल में क्यों पैदा हुई ये सोचने का विषय है, क्या बंगाल, गुजरात जहां भी अकबर युद्ध लड़ा था कभी जीतने के बाद नहीं गया तो, फिर हल्दी घाटी क्यों आया था? ये एक विचारणीय प्रशन है। साथ ही मुगलों द्वारा बार बार मेवाड़ अभियान करना कई सालों तक, शर्मा बोलै क्या कभी जीती हुई चीज को पुनः जीतने का प्रयास किया जाता है ? या फिर एक बार हारी हुई चीज को पुनः जीतने का प्रयास किया जाता है ?

लेकिन अपनी इस उपलब्धि को लेकर कार्यक्रम के दौरान मंच पर मौजूद किसी भी व्यक्ति द्वारा उनका नाम नहीं लेने या फिर इसका श्रेय नहीं देने पर शर्मा ने नाराजगी भी जताई। 

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