राजसमंद में 16 बीघा ज़मीन पर चार दावेदार आमने-सामने

पुलिस के साए में ग्राम सभा, गांव दो धड़ों में बंटा

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Rajsamand Land Dispute

राजसमंद 22 जनवरी 2026। ज़िले की ग्राम पंचायत बामन टुकड़ा में स्थित बिला नाम भूमि खसरा संख्या 1685 को लेकर गांव में जबरदस्त टकराव और तनाव की स्थिति बन गई। करीब 16 बीघा से अधिक बेशकीमती जमीन अब भूमि माफियाओं और सत्ता-संरक्षित दलालों की नज़र में आ गई है। जमीन को लेकर चार-चार दावेदार आमने-सामने खड़े हैं, जिससे पूरा गांव दो धड़ों में बंट गया।

एक पक्ष इस भूमि को लक्ष्मी नारायण गौशाला के लिए आवंटित करने की मांग कर रहा है, दूसरा पक्ष इसे ट्रांसपोर्ट नगर/मार्बल मंडी में बदलने की पैरवी कर रहा है, तीसरा खुद को जमीन का मालिक बता रहा है, जबकि चौथा पक्ष कब्जे का दावा ठोक रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि इस जमीन में कीमती मिनरल मौजूद हैं और यही वजह है कि अब यह जमीन माफिया सिंडिकेट के लिए सोने की खान बन चुकी है।

पेड़ कटाई और अवैध बिक्री के गंभीर आरोप

ग्रामवासियों ने आरोप लगाया कि जमीन के भीतर मौजूद उपजाऊ पेड़-पौधों को गुपचुप तरीके से काटकर बेच दिया गया, जबकि प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगने दी गई। वहीं सरपंच पर आरोप है कि उन्होंने इस भूमि को बेचने की नीयत से जानबूझकर गौशाला के नाम पर “न्यायिक वाद” का बहाना खड़ा किया।

ग्रामीणों का कहना है कि जब गौशाला के लिए न्यायिक वाद आड़े आता है, तो मार्बल मंडी के लिए वही जमीन आरक्षित करने की बात कैसे की जा सकती है?
यही सवाल सरपंच की दोहरी नीति और संदिग्ध भूमिका को उजागर करता है।

पुलिस के साए में ग्राम सभा

स्थिति इतनी बिगड़ गई कि ग्राम सभा को पुलिस बल की मौजूदगी में आयोजित करना पड़ा। प्रशासन को आशंका थी कि विवाद कभी भी हिंसक रूप ले सकता है। गांव की करीब एक चौथाई आबादी ने सरपंच के फैसले का खुलकर विरोध किया।

गौसेवकों का साफ ऐलान

गौसेवकों ने दो टूक शब्दों में कहा कि हर हाल में गौशाला के लिए भूमि आवंटन कराया जाएगा, चाहे इसके लिए सड़क से लेकर कलेक्ट्री तक आंदोलन करना पड़े।

प्रशासन और मंत्री की सख्ती

ज़िला कलेक्टर राजसमंद ने लक्ष्मी नारायण गौशाला सेवा समिति के भूमि आवंटन मामले में ग्राम पंचायत पर सख्त रुख अपनाया है। वहीं विवाद की गंभीरता को देखते हुए गोपालन मंत्री जोराराम कुमावत ने स्वयं ज़िला कलेक्टर से फोन पर बात कर प्रकरण का त्वरित निस्तारण करने के निर्देश दिए हैं।

स्थानीय राजस्व अधिकारियों का इस अहम बैठक से दूरी बनाना भी कई सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो यह मामला बड़े भूमि घोटाले में तब्दील हो सकता है।

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