होटल हित से पहले रखें हिल और झील हित को


होटल हित से पहले रखें हिल और झील हित को

वेटलैंड नियम चार की अनुपालना करवाये प्रशासन

 
jheel

उदयपुर। झील प्रेमियों ने जिला कलेक्टर व राज्य सरकार से आग्रह किया है कि होटल हित से पहले हिल (पहाड़ी) व झील हित को रखा जाए। रविवार को आयोजित झील संवाद में झील संरक्षण समिति के डॉ अनिल मेहता ने कहा कि झीलें व पहाड़ पर्यटन का मुख्य आधार है। पानी, पेड़, पहाड़ व पर्यावरण बने रहे तो पर्यटन पनपेगा और इसी से होटल-रिसॉर्ट व्यवसाय बना रहेगा। 

मेहता ने कहा कि उदयपुर की समस्त झीलें वेटलैण्ड है तथा भारत सरकार के वेटलैण्ड संरक्षण नियम के नियम चार के प्रावधानों के अनुरूप संरक्षित सुरक्षित श्रेणी में है। जिला प्रशासन को तुरन्त इनके अधिकतम भराव तल सीमा से पचास मीटर क्षेत्र तथा जोन ऑफ़ इन्फ्लुएंस में हो रहे समस्त व्यावसायिक निर्माणों व प्रदूषणकारी गतिविधियों को रुकवा कर न्यायालयी निर्णयों की अनुपालना करवानी चाहिए।    

झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि पेयजल प्रदान करने वाली एवं पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील झीलों के हित मे  सड़क मार्ग से जुड़ी होटलों को नाव से पर्यटक परिवहन की अनुमति नही दी जानी चाहिए। झीलों में रेस्कयू बोट को छोड़कर ईंधन चालित समस्त नावों पर प्रतिबंध कर देना चाहिए। चप्पू व पैडल वाली नावें पर्यटन को बढ़ाएगी व पर्यावरण को सुरक्षित रखेगी।

गांधी मानव कल्याण सोसायटी के निदेशक नंद किशोर शर्मा ने कहा कि झीलों में नावों की संख्या नियंत्रित की जाए तथा उनके रुट का भी निर्धारण हो। नाव  भ्रमण क्षेत्र निर्धारित करने के लिए फ्लोट लगाये जाएँ ताकि कोई भी नाव इसका उल्लंघन नही कर सके। गणगौर बोट से बड़ी साइज की कोई बोट अनुमत नही की जाए।

पर्यावरणविद कुशल रावल ने कहा कि झीलों के व कुल जल फैलाव के केवल दस प्रतिशत क्षेत्र में ही नावों के संचालन की अनुमति हो ताकि शेष झील क्षेत्र में  देशी प्रवासी पक्षी व जलचरों को सुरक्षा मिल जैव विविधता पोषित होती रहे।
  
वरिष्ठ नागरिक द्रुपद सिंह व रमेश चंद्र राजपूत ने कहा कि न्यायालयी रोक के बावजूद बड़े पैमाने पर पहाड़ियां काटी जा रही है। यह दुःखद है। पहाड़ियां नही बची तो उदयपुर का पूरा जल तंत्र तहस नहस हो जाएगा। संवाद से पूर्व स्वरूप सागर घाट के आसपास झील में श्रमदान कर कचरा व विविध प्रकार की गंदगी को निकाला गया।

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