तपती गर्मी में आस्था का अद्भुत दृश्य
डेरावड़ मठ में 21 दिवसीय नव धूणी अग्नि तपस्या का भव्य समापन
उदयपुर 22 अप्रैल 2026। अप्रैल माह की प्रचंड गर्मी के बीच, जहां आमजन तपिश से बचने के उपाय खोज रहे हैं, वहीं मेवाड़ क्षेत्र के भींडर के निकट डेरावड़ स्थित श्री रूपनाथ जी मठ में आस्था, तप और साधना का अद्वितीय संगम देखने को मिला। गुरुवार को यहां आयोजित छठी 21 दिवसीय नव धूणी अग्नि तपस्या का श्रद्धा एवं उत्साह के साथ भव्य समापन हुआ।
इस अवसर पर विभिन्न स्थानों से पधारे संत-महात्माओं की गरिमामयी उपस्थिति रही। गोगुन्दा से दौलत गिरि जी महाराज, धूणी माता कुंडाल से डालू दास जी महाराज, राजसमंद से पागल नाथ जी महाराज सहित मुख्य अतिथि देवेन्द्र सिंह शक्तावत (भींडर) समारोह में उपस्थित रहे।

यह तपस्या श्री श्री 108 महंत योगी प्रेमनाथ जी महाराज के सान्निध्य में जनकल्याण एवं विश्व शांति की कामना के साथ आयोजित की गई। कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों के स्वागत से हुई, जिसके पश्चात माँ हिंगलाज माता की विधिवत आरती एवं भजन-कीर्तन का आयोजन किया गया।
गुरुदेव के नव धूणी स्थल पर आगमन के पश्चात धूणियों की पूजा, आरती एवं हवन सम्पन्न हुआ। तत्पश्चात गुरुदेव ने भभूति धारण कर तपस्या का आसन ग्रहण किया। दोपहर के समय, जब सूर्य अपनी चरम तपिश पर था, तब गुरुदेव नौ प्रज्वलित अग्नियों के मध्य लगभग तीन घंटे तक गहन साधना में लीन रहे। यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत प्रेरणादायक एवं आस्था से परिपूर्ण रहा।

क्या है नव धूणी अग्नि तपस्या
गुरुदेव के अनुसार इस तपस्या में नौ दिशाओं में अग्नि कुंड स्थापित किए जाते हैं, जिनमें प्रतिदिन बढ़ती संख्या में गोबर के कंडों (थेपड़िया) से अग्नि प्रज्वलित की जाती है। यह साधना पंच तत्व अग्नि, जल, पृथ्वी, आकाश एवं वायु को साक्षी मानकर की जाती है। अग्नि तत्व के लिए नव कुंड, जल तत्व के लिए कलश स्थापना तथा आकाश तत्व के लिए भभूति धारण की जाती है।
समापन अवसर पर माँ हिंगलाज के हवन में पूर्णाहुति दी गई तथा गुरुदेव के सान्निध्य में शिष्यों द्वारा गुरु पूजन किया गया। जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो उठा। कार्यक्रम के अंत में श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से प्रसाद ग्रहण किया।
मठ समिति के अनुसार इस प्रकार के धार्मिक आयोजन क्षेत्र में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करते हैं तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं।
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