राजसमंद में अनोखी मिसाल: ऑडी छोड़ बैलगाड़ी से भरा मायरा
राजसमंद 22 अप्रैल 2026। आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के बीच जहां पारंपरिक रीति-रिवाज धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं, वहीं राजसमंद के उपनगर धोइंदा में एक अनोखी पहल देखने को मिली। यहां निवासी मुकेश कुमावत ने अपनी धर्म बहन के विवाह में मायरा भरने के लिए बैलगाड़ी का चयन कर समाज को अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश दिया।
धोइंदा निवासी मुकेश कुमावत ने धर्म बहन रूक्मणी देवी के विवाह अवसर पर पारंपरिक अंदाज में मायरा भरने का निर्णय लिया। मंगलवार को धोइंदा बस स्टैंड पर सैकड़ों लोग एकत्रित हुए, जहां रंग-बिरंगी सजावट से सजी बैलगाड़ी आकर्षण का केंद्र बनी रही। बैलों को भी रंगीन धारियों, रिबन और मोरपंख से सजाया गया था, जिससे पूरा दृश्य पारंपरिक रंग में रंगा नजर आया।
मायरे का सामान बैलगाड़ी में सजाकर मुकेश कुमावत अपनी पत्नी मायादेवी के साथ मारवाड़ी वेशभूषा में सवार हुए और स्वयं बैलगाड़ी हांकते हुए रवाना हुए। इस दौरान आगे डीजे पर पारंपरिक मायरे के गीत बज रहे थे, जिन पर स्त्री-पुरुष नृत्य करते हुए चल रहे थे। महिलाएं मंगल गीत गा रही थीं और थाली-मादल की मधुर ध्वनि वातावरण को भक्तिमय बना रही थी।

मायरे की यह शोभायात्रा गणेश चौक, कैलाश चौराहा और तेजाजी चौक होते हुए स्कूल मैदान के पास स्थित धर्म बहन के घर पहुंची, जहां सामाजिक रस्में निभाई गईं। रास्ते भर लोगों की भीड़ इस अनूठे दृश्य को देखने उमड़ पड़ी और जगह-जगह मायरे का स्वागत किया गया।
पहले भी कर चुके हैं पहल
मुकेश कुमावत इससे पहले भी पारंपरिक तरीकों से मायरा भरने की पहल कर चुके हैं। गत वर्ष उन्होंने राजनगर में अपनी धर्म बहन के यहां भी बैलगाड़ी से मायरा भरा था। उनकी कोई सगी बहन या बेटी नहीं है, इसलिए उन्होंने धर्म बहनों के प्रति यह परंपरा निभाई है।
लग्जरी जीवन के बीच परंपरा से जुड़ाव
मुकेश कुमावत पेशे से आलू व्यापारी हैं और उनके पास ऑडी जैसी महंगी कार भी है, लेकिन इसके बावजूद वे अपनी संस्कृति और परंपराओं को प्राथमिकता देते हैं। उनका मानना है कि पारंपरिक रस्में हमें सुकून और आनंद देती हैं, इसलिए इन्हें बचाए रखना जरूरी है।
लोगों ने की सराहना
इस अनूठी पहल को देखकर लोगों ने जमकर सराहना की और कहा कि यदि ऐसी परंपराओं को नहीं सहेजा गया तो आने वाली पीढ़ी इन्हें केवल किताबों में ही देख पाएगी। पूरे क्षेत्र में इस मायरे की चर्चा बनी रही और लोगों ने इसे संस्कृति संरक्षण की प्रेरणादायक पहल बताया।
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