कैंसर की दवा मुंह से देने की तकनीक विकसित, सुखाड़िया विवि की शोध टीम को मिला पेटेंट

प्रयोगशाला परीक्षणों में मिले उत्साहजनक परिणाम शोध टीम के अनुसार, जेमसिटाबाइन युक्त नैनोस्ट्रक्चर्ड लिपिड कैरियर से दवा का धीरे-धीरे रिलीज होना 72 घंटे तक दर्ज किया गया

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Cancer Treatment Udaipur

 

Udaipur Times News, Medical News, Cancer Treatment, उदयपुर 19 अक्टूबर 2026 । कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं को मरीजों तक अधिक सुविधाजनक तरीके से पहुंचाने की दिशा में मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के फार्मेसी विभाग की शोध टीम ने महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।

टीम ने कैंसर की दवा को मुंह के जरिए देने के लिए विशेष नैनो-फॉर्मूलेशन तकनीक विकसित की है। इस शोध के तहत विकसित तकनीक को वर्ष 2026 में भारतीय पेटेंट भी मिला है। यह शोध भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) की ओर से राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (रूसा) के तहत वित्तपोषित परियोजना के अंतर्गत किया गया।

परियोजना का नाम “Design, Development and Characterisation of Oral Nanoformulation for Treatment of Cancer” था। इसमें फार्मेसी विभाग की प्रोफेसर डॉ. गरिमा जोशी ने प्रधान अन्वेषक के रूप में कार्य किया। Medical News Udaipur 

डॉ. दीपक चौधरी और डॉ. हरीश सह-प्रधान अन्वेषक रहे, जबकि शेख शहनवाज कादिर को जूनियर रिसर्च फेलो नियुक्त किया गया था। ## अग्नाशय के कैंसर पर केंद्रित रहा शोध शोध में नैनोस्ट्रक्चर्ड लिपिड कैरियर (एनएलसी) और पीएलजीए नैनोपार्टिकल्स विकसित किए गए।

इनका उद्देश्य जेमसिटाबाइन हाइड्रोक्लोराइड और पैक्लिटैक्सेल जैसी कैंसररोधी दवाओं को मुंह के जरिए शरीर तक पहुंचाना था।

वर्तमान में कीमोथेरेपी की कई दवाएं नसों के माध्यम से दी जाती हैं, जिसके लिए मरीजों को बार-बार अस्पताल जाना पड़ सकता है। इनके साथ बाल झड़ने और बोन मैरो पर दुष्प्रभाव जैसे जोखिम भी जुड़े हो सकते हैं। Cancer Treatment News 

डॉ. गरिमा जोशी ने बताया, “हमारे शोध का उद्देश्य ऐसी ओरल नैनो-फॉर्मूलेशन तकनीक विकसित करना था, जिससे कैंसररोधी दवाओं का शरीर में अवशोषण बेहतर हो, दवा का प्रभाव लंबे समय तक बना रहे और उसे ट्यूमर कोशिकाओं तक पहुंचाने की संभावनाओं को बेहतर बनाया जा सके।” Udaipur News 

प्रयोगशाला परीक्षणों में मिले उत्साहजनक परिणाम शोध टीम के अनुसार, जेमसिटाबाइन युक्त नैनोस्ट्रक्चर्ड लिपिड कैरियर से दवा का धीरे-धीरे रिलीज होना 72 घंटे तक दर्ज किया गया।

अग्नाशय के कैंसर से जुड़ी पीएएनसी-1 कोशिकाओं पर प्रयोगशाला परीक्षणों में इस फॉर्मूलेशन ने सामान्य जेमसिटाबाइन की तुलना में लगभग पांच गुना अधिक साइटोटॉक्सिक प्रभाव दिखाया।

पशुओं पर किए गए परीक्षणों में दवा की ओरल बायोअवेलेबिलिटी यानी मुंह से लेने के बाद शरीर में उपलब्धता में 10.5 गुना वृद्धि दर्ज की गई। दवा का स्तर 24 घंटे तक बना रहा। डीएमबीए से उत्पन्न अग्नाशय संबंधी घावों के पशु मॉडल में उपचारित समूह में बीमारी की प्रगति रुकने के संकेत मिले। Oral Treatment Cancer 

इस समूह में पैनिन-3 स्तर के घाव या इनवेसिव कार्सिनोमा नहीं पाए गए। आंतों की बाधा के मॉडल में सीएसीओ-2 कोशिकाओं पर भी दवा के बेहतर अवशोषण से जुड़े परिणाम सामने आए। हालांकि, ये सभी निष्कर्ष प्रयोगशाला और पशु परीक्षणों पर आधारित हैं। 

2026 में मिला भारतीय पेटेंट शोध के आधार पर “Nanostructured Lipid Carrier with Acidic Aqueous Phase for Enhanced Gemcitabine Hydrochloride Entrapment” नाम से भारतीय पेटेंट संख्या 579413 वर्ष 2026 में प्रदान किया गया।

परियोजना के तहत विश्वविद्यालय में आधुनिक प्रयोगशाला सुविधाओं और शोध उपकरणों का भी विकास हुआ, जिससे भविष्य में फार्मास्यूटिकल नैनोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में शोध को बढ़ावा मिलेगा। इस शोध से जुड़े निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुए हैं, जिनमें Journal of Drug Delivery Science and Technology शामिल है।

शोध ने अंतरराष्ट्रीय अवसरों का रास्ता खोला शोधार्थी शेख शहनवाज कादिर को भारत सरकार के साइंस एंड इंजीनियरिंग रिसर्च बोर्ड (एसईआरबी) की ओर से अंतरराष्ट्रीय यात्रा अनुदान मिला था। इसके माध्यम से उन्होंने वर्ष 2023 में ऑस्ट्रिया के ग्राज में आयोजित BioNanoMed सम्मेलन में शोध निष्कर्ष प्रस्तुत किए।

इस शोध कार्य ने कादिर के आगे के अकादमिक सफर की नींव तैयार करने में भी योगदान दिया। उन्हें ब्रिटेन में कॉमनवेल्थ स्प्लिट-साइट पीएचडी स्कॉलरशिप मिली।

लिवरपूल जॉन मूर्स यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर इमरान सलीम के मार्गदर्शन में उन्होंने स्तन कैंसर के उपचार के लिए siRNA आधारित नैनोकैरियर डिलीवरी पर शोध का विस्तार किया।

 मरीजों तक पहुंचने से पहले जरूरी होंगे क्लीनिकल ट्रायल शोध टीम के अनुसार, यह तकनीक अभी प्री-क्लीनिकल चरण में है।

मरीजों में इसकी सुरक्षा, सही खुराक और प्रभावशीलता साबित करने के लिए आगे विस्तृत अध्ययन और क्लीनिकल ट्रायल जरूरी होंगे।

इसलिए फिलहाल इसे कैंसर का स्थापित उपचार या पारंपरिक कीमोथेरेपी का विकल्प नहीं माना जा सकता। सफल परीक्षणों के बाद यह तकनीक भविष्य में कैंसर की दवाएं देने के अधिक सुविधाजनक तरीके के विकास में मदद कर सकती है।

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