भीलवाड़ा में 426 साल पुरानी परंपरा ‘मुर्दे की सवारी’ निकली

शीतला अष्टमी पर अनोखी शवयात्रा देख उमड़ी भीड़

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426 year old Murde Ki Sawari tradition procession in Bhilwara during Sheetla Ashtami with youth lying on a bier

भीलवाड़ा 12 मार्च 2026 - भीलवाड़ा में बुधवार को शीतला अष्टमी के अवसर पर 426 साल पुरानी परंपरा ‘मुर्दे की सवारी’ निकाली गई। होली के आठ दिन बाद निभाई जाने वाली इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए शहर में बड़ी संख्या में लोग जुटे।

परंपरा के अनुसार एक युवक को अर्थी पर लिटाकर ढोल-नगाड़ों के साथ शहर में शवयात्रा निकाली गई। इस दौरान लोग गुलाल और अबीर उड़ाते हुए हंसी-मजाक करते नजर आए। अर्थी पर मुर्दा बनकर लेटे युवक को साथ चल रहे लोगों ने जूते-चप्पलों से प्रतीकात्मक रूप से पीटा। बीच-बीच में युवक अर्थी से उठकर नाचने भी लगा, जिससे माहौल और भी रंगीन हो गया।

यह सवारी शहर की चित्तौड़ वालों की हवेली से शुरू होकर रेलवे स्टेशन चौराहा, गोल प्याऊ और भीमगंज क्षेत्र से होती हुई बड़े मंदिर पहुंची। यहां पहुंचने पर अर्थी पर लेटा युवक अचानक उठकर भाग निकला। इसके बाद परंपरा के अनुसार प्रतीकात्मक रूप से अर्थी का दाह संस्कार किया गया।

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इस परंपरा के दौरान फब्तियों और मजाक का दौर भी चलता है, इसलिए इसमें महिलाएं शामिल नहीं होती हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस परंपरा से समाज में आपसी मतभेद और कड़वाहट दूर होती है और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। यही वजह है कि हर साल शहरवासी पूरे उत्साह के साथ इस अनोखे आयोजन में हिस्सा लेते हैं।

अर्थी पर मुर्दा बनकर लेटे युवक रामजी ने बताया कि यह वर्षों पुरानी परंपरा है और इसमें भाग लेकर उन्हें अलग ही अनुभव हुआ। उन्होंने कहा कि सवारी के दौरान लोगों ने उन्हें जूते-चप्पलों से मारा, लेकिन यह सब परंपरा का हिस्सा है।

मुर्दे की सवारी अपने अंतिम चरण में पहुंचने के बाद पुराने भीलवाड़ा के गुलमंडी क्षेत्र से होती हुई नाला बाजार स्थित होली के स्थान पर पहुंचती है, जहां प्रतीकात्मक रूप से अर्थी का अंतिम संस्कार किया जाता है।

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