कुत्तों को नहीं हटा सकते तो इंसानों को ही शिफ्ट कर दो
उदयपुर 16 फ़रवरी 2026। शहर में आवारा कुत्तों के बढ़ते आतंक को लेकर शहरवासियों का आक्रोश अब खुलकर सामने आने लगा है। तिलक नगर सेक्टर 3 क्षेत्र में आवारा कुत्तों के झुंड ने भय और असुरक्षा का माहौल बना दिया है। राहगीरों का पीछा करना, लपकना और डराना अब रोजमर्रा की घटना बन चुकी है। इससे बच्चे, महिलाएं एवं बुजुर्ग स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
तिलक नगर निवासी अंकिता छाजेड़ ने बताया कि वे या उनके बच्चे जैसे ही घर से स्कूटी या पैदल निकलते हैं, कुत्ते पीछे पड़ जाते हैं। “हर दिन डर के साथ घर से निकलना पड़ता है। समझ में नहीं आता कब कौन सी घटना हो जाए।
निशा चपलोत ने बताया कि एक बार वे बच्चों को स्कूल से लेकर लौट रही थीं, तभी कुत्ते अचानक पीछे पड़ गए और वे गिरते-गिरते बचीं। “अगर उस दिन संतुलन बिगड़ जाता तो बड़ा हादसा हो सकता था,” उन्होंने चिंता जताते हुए बताया कि गली में बुजुर्गों का सुबह-शाम टहलना लगभग बंद हो गया है और बच्चे बाहर खेलने से डर रहे हैं।
शानी जैन एवं खुशबु जैन ने कहा कि गली से बाहर निकलते ही कुत्ते परेशान करने लगते हैं। कई बार राहगीरों ने बीच-बचाव कर उन्हें बचाया है। “हर दिन किसी न किसी को डरकर भागना पड़ता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यह स्थिति कब तक चलेगी?”

प्राची मारू ने बताया कि सुबह सैर पर निकलते समय कुत्तों के पीछे पड़ने से वे गिर गईं। आसपास के लोगों ने आवाज सुनकर मदद की, तब जाकर वे सुरक्षित बच सकीं।
इंसानों की सुरक्षा और कॉलोनी में शांतिपूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कॉलोनीवासियों की एक बैठक आयोजित की गई, जिसमें अंकिता छाजेड़, शानी जैन, खुशबु जैन, हीना नाहर, रवि इडिवाल, संदीप नाहर, प्रसून जैन, प्रदीप चपलोत, विकी कोठारी विकास छाजेड़ सहित अन्य निवासी उपस्थित रहे। बैठक में महिलाओं ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जिन्हें कुत्तों की चिंता है, वे आवारा कुत्तों को अपने घर ले जाकर पालें। कॉलोनी इंसानों के रहने की जगह है, लेकिन यहां बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग कोई भी सुरक्षित नहीं हैं।
बैठक में कहा गया कि जहां बच्चों को नोचने की घटनाएं सामान्य होती जा रही हैं, जहां डॉग बाइटिंग के मामले लगातार सामने आ रहे हैं, वहां भी प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है। “क्या आम नागरिक की जान की कोई कीमत नहीं? क्या हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करना व्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं?” यह प्रश्न बार-बार उठाया गया।
रहवासियों ने प्रशासन पर तंज कसते हुए कहा कि अक्सर कोर्ट के आदेशों का हवाला देकर कुत्तों को हटाने में असमर्थता जताई जाती है। यदि नियमों के अनुसार कुत्तों को कॉलोनी में ही रखना है, तो क्या इंसानों के लिए कोई सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराया जाएगा? क्या यह व्यवस्था न्यायसंगत कही जा सकती है?
बैठक में यह भी सवाल उठा कि क्या सरकार, प्रशासन या न्यायालय नैतिकता के आधार पर स्वतः संज्ञान नहीं ले सकते? क्या आम नागरिकों को हर बार धरना, आंदोलन या ज्ञापन का सहारा लेना ही पड़ेगा? क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही कार्रवाई होगी?
कॉलोनीवासियों ने स्पष्ट किया कि वे कानून का सम्मान करते हैं और किसी प्रकार का टकराव नहीं चाहते, लेकिन मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि बिना देरी किए ठोस रणनीति बनाकर तत्काल प्रभाव से आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान किया जाए, ताकि क्षेत्र में भयमुक्त वातावरण स्थापित हो सके।
चेतावनी देते हुए रहवासियों ने कहा कि यदि शीघ्र सुनवाई नहीं हुई तो वे जिला कलेक्टर सहित संबंधित सभी स्तरों पर अपनी बात रखेंगे, ज्ञापन सौंपेंगे और आवश्यकता पड़ने पर लोकतांत्रिक तरीके से आगे की कार्रवाई करेंगे।
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