उदयपुर के कलाकार ने भील कला को दी नई पहचान
मांगीलाल भील मोर पंखों को बना रहे हैं चित्रकारी का कैनवास, मेवाड़ की आदिवासी संस्कृति को दे रहे नया आयाम
उदयपुर 18 मई 2026 - शहर के कलाकार मांगीलाल भील ने पारंपरिक भील कला को एक नया आयाम देते हुए मोर पंखों को अपनी चित्रकारी का कैनवास बना दिया है। उनकी अनोखी कला इन दिनों कला प्रेमियों और सांस्कृतिक जगत के बीच खास चर्चा का विषय बनी हुई है। नाजुक मोर पंखों पर उकेरी गई भील संस्कृति की झलक न केवल लोगों को आकर्षित कर रही है, बल्कि मेवाड़ की आदिवासी परंपराओं को भी नई पहचान दिला रही है।
मांगीलाल भील की कला यात्रा किसी औपचारिक प्रशिक्षण से नहीं, बल्कि पारिवारिक परंपराओं से शुरू हुई। बचपन में उन्होंने अपनी दादी और नानी को घर की दीवारों और आंगन में पारंपरिक चित्रकारी करते देखा। यही दृश्य उनके भीतर कला के प्रति रुचि जगाने का कारण बने। धीरे-धीरे रंगों और लोक आकृतियों के प्रति उनका लगाव बढ़ता गया। उनके जीवन में मोड़ तब आया जब उन्हें पहाड़ी क्षेत्र में एक मोरनी का पंख मिला। उस पंख को देखकर उनके मन में विचार आया कि क्यों न इसे ही चित्रकारी का माध्यम बनाया जाए।
इसके बाद उन्होंने पंखों पर भील शैली की चित्रकारी का प्रयोग शुरू किया।
शुरुआत आसान नहीं थी। पंखों की महीन और संवेदनशील सतह पर चित्र बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण था। हल्की सी गलती पूरी आकृति को खराब कर सकती थी, लेकिन लगातार अभ्यास और धैर्य ने उन्हें इस कला में दक्ष बना दिया। आज मांगीलाल के बनाए चित्रों में भील संस्कृति का जीवंत स्वरूप दिखाई देता है।
उनकी कलाकृतियों में आदिवासी जीवन, प्रकृति, पशु-पक्षी, देवी-देवताओं और लोक परंपराओं की झलक देखने को मिलती है। विशेष रूप से मेवाड़ के प्रसिद्ध गवरी नृत्य के पात्रों को उन्होंने अपनी कला में बेहद आकर्षक ढंग से उकेरा है। उनकी चित्रकारी में रंगों का संतुलन और रेखाओं की बारीकी दर्शकों को लंबे समय तक बांधे रखती है। मांगीलाल की इस अनूठी कला को राज्य स्तर पर भी पहचान मिली है। उन्हें उनकी उत्कृष्ट कला के लिए राज्यपाल द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
अब वे अपनी कला को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने की तैयारी में जुटे हैं। इसके लिए वे गवरी पात्रों पर आधारित एक विशेष श्रृंखला तैयार कर रहे हैं, जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। स्थानीय कला विशेषज्ञों का मानना है कि मांगीलाल भील ने पारंपरिक भील पेंटिंग को आधुनिक प्रस्तुति देकर नई दिशा दी है। उनकी कला केवल चित्रकारी नहीं, बल्कि मेवाड़ की आदिवासी संस्कृति, लोक जीवन और परंपराओं का जीवंत दस्तावेज बन चुकी है। उनकी यह पहल युवा कलाकारों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रही है।
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