उदयपुर मे सौर वैधशाला मे जुटे देश के प्रमुख भौतिक वैज्ञानिक एवं अनुसंधानकर्ता

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Udaipur Times, Udaipur Solar Observatory: भारत आज अंतरिक्ष के क्षेत्र में तेजी से ऊभर रहा है अपने नवीनतम कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी स्थिति और मजबूत कर रहा है। वर्तमान में पृथ्वी की विभिन्न कक्षाओं में परिभ्रमण कर रहे कृत्रिम उपग्रहों को सुरक्षित रखने के लिए मिशन "दिशा" प्रारम्भ किया है।

सोलर वैधशाला उदयपुर की ओर से आयोजित हो रही राष्ट्रीय भौतिकी बैठक में भाग लेने आये अंतरिक्ष विभाग की भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला के डीन प्रो डी. पल्लम राजू ने कहा कि डिस्टर्ब्ड एंड क्वाइट टाइम लोनोस्फेयर-थर्मोस्फेयर सिस्टम एट हाइ एल्टीट्यूड अर्थात दिशा कार्यक्रम पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल का अध्ययन करने के लिए एक जुड़वां उपग्रह मिशन है। ये हमारे सौर रिसर्च एंड स्पेस रिसर्च का मिलन है जिसके तहत तीन इंस्ट्रूमेंट्स का निर्माण किया जा रहा है। दिशा मिशन से अंतरिक्ष में जुड़ा उपग्रहों के माध्यम से सूर्य में उठने वाले सौर तूफानों की समय पर जानकारी प्राप्त की जा सकेगी।

उन्होने बताया कि सूर्य मे उठने वाले जियोमेग्नेटिक तूफानों से बहुत बड़ी मात्रा में इलोक्ट्रोन्स पृथ्वी की ओर तेजी से बढ़ते हैं। इस कारण आयन मंडल में बड़ी हलचल होती है जिससे पृथ्वी की कक्षा में घूम रहे कृत्रिम उपग्रहों को हानि पहुंच सकती है। ऐसे में दिशा मिशन से सौर तूफानों की समय पर जानकारी मिल जाने से उपग्रहों को कुछ समय के लिए बंद कर नुकसान से बचाया जा सकेगा।

अंतरिक्ष अनुसंधान में अग्रणी है भारत

प्रो पल्लम राजू ने बताया कि अंतरिक्ष मौसम संबंधी रिसर्च के क्षेत्र में भारत बहुत तेज़ी से प्रगति कर रहा है और इसरो की घोषणा के अनुसार 2035 तक अंतरिक्ष में भारत का अपना भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित कर लिया जाएगा। इसके अलावा अगला चंद्रयान मिशन भी अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत की बड़ी छलांग माना जा रहा है।

देशभर से जुटे हैं वैज्ञानिक एवं अनुसंधानकर्ता

पीआरएल के निदेशक प्रो अनिल भारद्वाज ने बताया कि राष्ट्रीय भौतिकी बैठक में देश के माने हुए भौतिक विज्ञानी और अनुसंधानकर्ता भाग ले रहे हैं। पहले इस प्रकार की बैठकों में लंबे व्याख्यान होते थे लेकिन अनुसंधान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अब इसमें आपसी संवाद को मुख्य स्थान दिया गया है। इस संवाद में होने वाले मंथन से देश में सौर अनुसंधान के क्षेत्र में हो रही गतिविधियों में और तेजी आयेगी।

वैधशाला के पूर्व वैज्ञानिक अशोक अम्बास्था ने कहा कि प्रमुख भौतिक विज्ञानी प्रो अरविंद भटनागर के प्रयासों से उदयपुर को 1975 में सौर वैधशाला की सौगात मिली थी। यहां का वर्ष पर्यंत रहने वाला साफ मौसम एवं झीलों का पानी इस स्थान के चयन के मुख्य आधार थे। वैधशाला के चारों ओर स्थित पानी से सूर्य के अध्ययन में आने वाली तरंगों की बाधा से मुक्ति मिलती है और साफ आसमान होने से लम्बे समय तक अध्ययन किया जा सकता है। आज यह वैधशाला 51 वर्ष की हो चुकी है। दस वर्ष पूर्य यहां पर सूर्य का अध्यययन करने वाली देश की सबसे बेहतरीन दूरबीन स्थापित की गई है।

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