लोक अदालत ने रोडवेज चेयरमैन को नोटिस जारी कर किया तलब

उदयपुर के अर्थ डायग्नोस्टिक के CEO डॉ. अरविंदर सिंह की याचिका पर सुनवायी: दिव्यांगों के मौलिक अधिकार और असुविधाजनक रोडवेज बस स्टैंडों को लेकर दायर की याचिका 
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उदयपुर, May 04, 2026: उदयपुर के अर्थ डायग्नोस्टिक के CEO तथा पेनेशिया डिसेबिलिटी राइट्स के अध्यक्ष  डॉ. अरविंदर सिंह की याचिका पर उदयपुर लोक अदालत ने राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (रोडवेज) को, चेयरमैन के माध्यम से नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई पर उपस्थित होकर याचिका पर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि निगम के चेयरमैन स्वयं अथवा अधिकृत सक्षम अधिकारी आवश्यक दस्तावेजों सहित उपस्थित होकर जवाब दाखिल करें। मामले की अगली सुनवाई 29 मई निर्धारित की गई है।

डॉ. अरविंदर सिंह ने अपनी याचिका में बताया कि वे पोलियो से प्रभावित हैं और 50 प्रतिशत शारीरिक दिव्यांगता के साथ जीवन यापन कर रहे हैं। जयपुर जाने हेतु जब वे उदियापोल रोडवेज बस स्टैंड पहुंचे, तो वहां का अनुभव उनके लिए अत्यंत पीड़ादायक और गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला रहा। उन्होंने कहा कि प्रवेश द्वार से लेकर बस में चढ़ने तक दिव्यांगजनों के लिए न तो रैंप उपलब्ध था, न व्हीलचेयर, और न ही कोई अलग काउंटर या आवश्यक सुविधा-मानो यह सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था दिव्यांगजनों के लिए बनी ही न हो।

अत्यधिक कठिनाइयों के बावजूद वे किसी तरह बस तक पहुंचे, लेकिन बस में चढ़ पाना संभव नहीं हो सका।

याचिका के अनुसार, उनकी जयपुर जाने वाली ट्रेन छूट जाने के कारण उन्हें तत्काल यात्रा करनी थी, इसलिए वे बस स्टैंड पहुंचे। वहां पहुंचने पर उन्हें हर स्तर पर असुविधाओं का सामना करना पड़ा। दिव्यांगजनों के लिए अलग पार्किंग की व्यवस्था नहीं थी और प्रवेश द्वार भी सुगम्य नहीं था, जिससे सीढ़ियां चढ़ना-उतरना उनके लिए बेहद कठिन हो गया।

किसी यात्री की सहायता से वे पूछताछ खिड़की तक पहुंचे, परंतु वहां भी दिव्यांगजनों के लिए कोई अलग काउंटर उपलब्ध नहीं था। व्हीलचेयर की जानकारी लेने पर पता चला कि डिपो में ऐसी कोई सुविधा उपलब्ध ही नहीं है। अत्यधिक प्रयासों के बाद वे बस प्लेटफॉर्म तक पहुंचे।

जयपुर जाने के लिए टिकट लेने के बाद जब बस आई, तो उसमें चढ़ना उनके लिए एक गंभीर चुनौती बन गया। बस में न तो रैंप था और न ही व्हीलचेयर की सुविधा। ऊंची और असुविधाजनक सीढ़ियों के कारण चढ़ना जोखिमपूर्ण था, जिससे चोट लगने की आशंका थी। परिणामस्वरूप वे बस में सवार नहीं हो सके और उन्हें विवश होकर निजी वाहन से जयपुर जाना पड़ा।

उन्होंने यह भी बताया कि बस स्टैंड पर दिव्यांगजनों के लिए न तो शौचालय की व्यवस्था थी, न ही मार्गदर्शन हेतु साइनबोर्ड या ब्रेल टाइल्स, और न ही कोई आधिकारिक ऑडियो घोषणा प्रणाली उपलब्ध थी।

सार्वजनिक स्थानों और संसाधनों तक समान रूप से पहुंचना दिव्यांगजनों का एक मौलिक अधिकार है। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत बस स्टॉप, रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डों सहित सभी सार्वजनिक स्थलों को निर्धारित पहुंच मानकों के अनुरूप बनाया जाना अनिवार्य है, जिसमें पार्किंग, शौचालय, टिकट काउंटर और अन्य सुविधाएं शामिल हैं ।

सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने विभिन्न निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक स्थानों पर सुगम्यता सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है, और इसमें कमी होना दिव्यांगजनों की गरिमा एवं अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। इस संदर्भ में उदयपुर रोडवेज बस स्टैंड की स्थिति गंभीर चिंता का विषय है।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि रोडवेज निगम के कर्मचारियों की लापरवाही और उदासीनता के कारण शिकायतकर्ता को न केवल आर्थिक हानि हुई, बल्कि उन्हें असुविधा, मानसिक पीड़ा और गरिमा की हानि का भी सामना करना पड़ा।